Showing posts with label दुष्यंत कुमार. Show all posts
Showing posts with label दुष्यंत कुमार. Show all posts

Friday, September 3, 2021

चराग़ाँ हर एक घर के लिये ....दुष्यंत कुमार


कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये.
-दुष्यंत कुमार

मयस्सर=उपलब्ध, मुतमईन=संतुष्ट, मुनासिब=ठीक 

Monday, June 10, 2019

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है ..... दुष्यंत कुमार

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है ।
-दुष्यंत कुमार

Wednesday, October 10, 2018

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं .....दुष्यंत कुमार

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा 
मैं सजदे में नहीं था आप को धोखा हुआ होगा 

यहाँ तक आते आते सूख जाती है कई नदियाँ 
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा 

ग़ज़ब ये है की अपनी मौत की आहट नहीं सुनते 
वो सब के सब परेशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा 

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन सुन कर तो लगता है 
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा 

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में 
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा 

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं 
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा 

चलो अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें 
कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा

- दुष्यंत कुमार 

Tuesday, September 26, 2017

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है ,,,,,,,दुष्यंत कुमार

1933-1975
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

~  दुष्यंत कुमार

Sunday, March 13, 2016

सूखे फूल : उदास चिराग......दुष्यंत कुमार

1933-1975

आज लौटते दफ्तर से पथ पर कब्रिस्तान दिखा
फूल जहां सूखे बिखरे थे और चिराग टूटे-फूटे
यों ही उत्सुकता से से थोड़े फूल बटोर लिए
कौतुहलवश एक चिराग़ उठाया औ' संग ले आया।

थोड़ा सा जी दुखा, कि देखो, कितने प्यारे फूल
कितनी भीनी, कितनी प्यारी होगी इसका गंध कभी
सोचा, ये चिराग़ जिसने भी यहां जलाकर रक्खे थे
उसके मन में होगी कितनी पीड़ा स्नेह-पगी।

तभी आ गई गंध न जाने कैसे सूखे फूलों से
घर के बच्चे 'फूल-फूल' चिल्लाते आए मुझ तक भाग
मैं क्या कहता आखिर उस हक़ लेनेवाली पीढ़ी से
देने पड़े विवश होकर वे सूखे फूल, उदास चिराग़।

दुष्यंत कुमार
1933-1975