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Thursday, January 24, 2019

ग़ज़ल....सैयद गुलाम रब्बानी 'अयाज'

हार पर हार खाए जाता हूँ।
बेसबब फिर भी मुस्कुराता हूँ।

रोते रहते हैं आह भरते हैं,
हाल दिल का जिन्हें सुनाता हूँ।

सख्त मेहनत व जां फिशानी से,
पेट की आग मैं बुझाता हूँ।

अम्न क़ायम जहां में रखने का,
कोई नुस्खा नया बनाता हूँ।

इक इमारत नई खड़ी करके,
खूं  पसीना भी मैं बहाता हूँ।

अच्छा दम साज़ हो तो क्या कहना,
सुर से तेरे जो सुर मिलाता हूँ।

क्या करूं मैं 'अयाज़' अपनो को,
रोज़ करतब नए दिखाता हूँ।
- सैयद गुलाम रब्बानी 'अयाज'