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Sunday, October 25, 2020

हुई हैं उनसे मुलाकातें ...इश्तियाक अंसारी


अभी कुछ कुछ हुआ है उजाला

पर सवेरा होना बाकी है।


अभी मिली हैं आँखें उनसे

पर दिल मिलना बाकी है।


पेड़ों के अभी कुछ कुछ पत्ते झरे हैं

पर हरियाली अभी बाकी है।


अभी तो मैंने देखा है एक चाँद

पर उससे मुलाकात अभी बाकी है।


सुसख हवा चली है कुछ कुछ

पर गर्मी आना बाकी है।


अभी दो चार हुई हैं उनसे मुलाकातें

पर अभी प्यार होना बाकी है


-इश्तियाक अंसारी 

Thursday, August 27, 2020

तू चिंगारी बनकर उड़ री ....गोपाल सिंह नेपाली


तू चिंगारी बनकर उड़ री, जाग-जाग मैं ज्वाल बनूँ,
तू बन जा हहराती गँगा, मैं झेलम बेहाल बनूँ,

आज बसन्ती चोला तेरा, मैं भी सज लूँ लाल बनूँ,
तू भगिनी बन क्रान्ति कराली, मैं भाई विकराल बनूँ,

यहाँ न कोई राधारानी, वृन्दावन, बंशीवाला,
तू आँगन की ज्योति बहन री, मैं घर का पहरे वाला ।

बहन प्रेम का पुतला हूँ मैं, तू ममता की गोद बनी,
मेरा जीवन क्रीड़ा-कौतुक तू प्रत्यक्ष प्रमोद भरी,

मैं भाई फूलों में भूला, मेरी बहन विनोद बनी,
भाई की गति, मति भगिनी की दोनों मंगल-मोद बनी

यह अपराध कलंक सुशीले, सारे फूल जला देना ।
जननी की जंजीर बज रही, चल तबियत बहला देना ।

भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,
संगम है, गँगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है,

यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,
यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है,

पागल घडी, बहन-भाई है, वह आज़ाद तराना है ।
मुसीबतों से, बलिदानों से, पत्थर को समझाना है ।
-गोपाल सिंह नेपाली

Wednesday, August 26, 2020

जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे.... रामधारी सिंह दिनकर


वैराग्य छोड़ बांहों की विभा सम्भालो,
चट्टानों की छाती से दूध निकालो,
है रुकी जहां भी धार, शिलाएं तोड़ो,
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो।

चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे!
योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे!

जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है,
चिनगी बन फूलों का पराग जलता है,
सौन्दर्य बोध बन नई आग जलता है,
ऊंचा उठकर कामार्त्त राग जलता है।

अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे!
गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे!

जिनकी बांहें बलमयी ललाट अरुण है,
भामिनी वही तरुणी, नर वही तरुण है,
है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है,
वारुणी धार में मिश्रित जहां गरल है।

उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है,
तलवार प्रेम से और तेज होती है !

छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए,
मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाए,
दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है,
मरता है जो एक ही बार मरता है।

तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे!
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे !

स्वातन्त्रय जाति की लगन व्यक्ति की धुन है,
बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है !
वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे
जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे!

जब कभी अहम पर नियति चोट देती है,
कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है,
नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है,
वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है ।

चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे!
धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे!

उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है,
सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है,
विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिन्तन है,
जीवन का अन्तिम ध्येय स्वयं जीवन है।

सबसे स्वतन्त्र रस जो भी अनघ पिएगा!
पूरा जीवन केवल वह वीर जिएगा!
-रामधारी सिंह दिनकर

Friday, July 31, 2020

बदल के रख ही दिया मुझको ...अभिषेक शुक्ल


पुकार उसे कि अब इस ख़ामुशी का हल निकले,
जवाब आये तो मुम्किन है बात चल निकले।

ज़माना आग था और इश्क़ लौ लगी रस्सी,
हज़ार जल के भी कब इस बला के बल निकले!

मैं अपनी ख़ाक पे इक उम्र तक बरसता रहा,
थमा तो देखा कि कीचड़ में कुछ कमल निकले।

मैं जिसमें ख़ुश भी था, ज़िन्दा भी था,तुम्हारा भी था,
कई ज़माने निचोडूं तो एक पल निकले।

कुछ एक ख़्वाब वहां बो रहूंगा, सोचा है,
वो नैन अगर मेरे नैनों से भी सजल निकले।

मैं अपने हाथों को रोता था हर दुआ के बाद,
ख़ुदा के हाथ तो मुझसे ज़ियादः शल निकले।

दयार ए इश्क़ में सबका गुज़र नहीं मुम्किन,
कई जो पैरों पे आये थे,सर के बल निकले।

बहार जज़्ब है जिसमें, उसे बनाते हुए,
तमाम रंग मेरे कैनवस पे ढल निकले।

जमी हुई थी मेरी आंख इक अलाव के गिर्द,
कुछ एक ख़्वाब तो यूंही पिघल, पिघल निकले।

बदल के रख ही दिया मुझको उम्र भर के लिए,
तेरी ही तरह तेरे ग़म भी बेबदल निकले।

जो दिल में आये थे आहट उतार कर अपनी,
वो दिल से निकले तो फिर कितना पुर ख़लल निकले।
-अभिषेक शुक्ल

Thursday, July 23, 2020

फिर भी हम चले गए ...ज़फ़रुद्दीन ज़फ़र

दुष्यन्त' चले गए और 'अदम' चले गए,
ग़ज़ल तुम्हारे ज़ख़्म के मरहम चले गए।

मैं एक शेर तो पढ़ूं मगर दाद कौन देगा,
मेरी शायरी से पहले मोहतरम चले गए।

उनको मर जाने से इतना फायदा हुआ,
ज़िंदगी से बिछुड़कर सारे ग़म चले गए।

इतनी दुआएं दी कि मालामाल हो गया,
फ़कीर के कासे में जो दिरहम चले गए।

माहताब ने घर आने में कुछ देर कर दी,
अंधेरे के साथ जुल्फों के ख़म चले गए।

अगर फट गए तो सैलाब ज़रूर आएगा,
उनके घर मेरे आंसुओं के बम चले गए।

जन्नत से झांककर कहते हैं आज शायर,
मुशायरे हो रहे हैं फिर भी हम चले गए।

चोट खाकर भी उसने मैदान नहीं छोड़ा,
लगता है तीर हमारे कुछ नरम चले गए।

ललकार के बोलो कि सरहद छोड़ जाएं,
उनकी ताक़त के कब के भरम चले गए।

क़द का गुरूर ना कर ऐ साहिबे मसनद,
कितनों के सल्तनत और हरम चले गए।

छालों ने अभी तक भी पीछा नहीं छोड़ा,
ज़फ़र मुंह में निवाले क्या गरम चले गए।

-ज़फ़रुद्दीन ज़फ़र
एफ़-413, कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32