
दहलीज पर खड़ी औरत,
क्या सोचती है ?
नम आँखों से निहारती
आकाश का कोना कोना,
उड़ने को आकुल -व्याकुल,
पंख तौलती है,
तलाशती है राहें,मुक्ति के उस द्वार की,
स्वप्न भरी आँखें,
थामना चाहती हैं- क्षितिज के ओर छोर,
पर पांवों को लहूलुहान कर जाती हैं,
परम्पराओं की बेड़ियाँ,
दहलीज के इस ओर ...
उसका घर है, ममता है, ..जीवन का वर्तमान भी,
पर दहलीज के उस ओर ..
उसका स्वप्न पलता है,
आगत भविष्य की रंगीनियाँ हैं, मुक्ति है,
और संभावनाओं का खुला आकाश भी,
पर यहीं पर रोकती हैं भावनाएं,
द्वंद्व सा मचता हृदय में,
क्या करूँ उस मुक्ति का?
जो छीन लेगी पाँव के नीचे धरा?
और जब साँझ होगी,
डूबता सूरज भी नहीं साथ होगा,
तब अँधेरी कालिमा में,
कौन होगा साथ मेरे?
रोशनी बन कर नए प्रभात की ?
...और फिर कोर ..आँचल के भिगोती,
बालती दहलीज पर, एक दिया उम्मीद का,
इस आस में ...
फिर कभी पंख पाकर उड़ सकूंगी,.
.साथ मेरे -घर,मेरे अपने मेरे सपने ..
,..मेरा संसार होगा ..
बस यही एक स्वप्न जीती जा रही है-
''दहलीज पर खड़ी औरत ''

-पद्मा मिश्रा