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Thursday, May 7, 2020

और एक दिन ...मृदुला प्रधान

......... और एक दिन
झिंगुर ने
झिंगुरानी से यह कहा-
प्रिय.....
प्यार,कर्म,विश्वास
मिलाकर
जो दिवार हम
खड़ी किये
चलो-चलो
फिर से रंगते हैं
आखिर हम-तुम
क्यों लड़ते हैं ?

क्यों न आज हम
उन लम्हों की
कसमें खायें
सूर्य,चन्द्र और
अग्नि-वरुण-जल
साथ चले थे.....
क्यों न आज
हम
उन लम्हों का
जश्न मनायें
जहाँ हमारे स्वप्न
पले थे.........

क्यों न शून्य में
अपने दिल की
धड़कन खूब
गुँजायें
कोई नाद कहे
कोई ध्रुपद कहे
कोई ओम् कहे

हम सबको साथ मिलायें ..
-मृदुला प्रधान

Saturday, April 4, 2020

सरगोशियों का मलाल था .. मृदुला प्रधान

पिछले पोस्ट पर कई लोगों ने इच्छा व्यक्त की .. 
वहाँ जिस कविता का ज़िक्र हुआ था 
उसे पढ़ने की .. तो प्रस्तुत है ..

कभी मुंतज़िर चश्में
ज़िगर हमराज़ था
कभी बेखबर कभी
पुरज़ुनू ये मिजाज़ था
कभी गुफ़्तगू के हज़ूम तो 
कभी खौफ़-ए-ज़द
कभी बेज़ुबां
कभी जीत की आमद में मैं
कभी हार से मैं पस्त था...

कभी शौख-ए-फ़ितरत का नशा
कभी शाम-ए-ज़श्न  
ख़ुमार था 
कभी था हवा का ग़ुबार तो
कभी हौसलों का पहाड़ था
कभी ज़ुल्मतों के शिक़स्त में 
ख़ामोशियों का शिकार था
कभी थी ख़लिश कभी रहमतें 
कभी हमसफ़र का क़रार था..

कभी चश्म-ए-तर की 
गिरफ़्त में
सरगोशियों का मलाल था
कभी लम्हा-ए-नायाब में
मैं  भर रहा परवाज़ था
कभी  था उसूलों से घिरा
मैं रिवायतों के अजाब में
कभी था मज़ा कभी बेमज़ा 
सूद-ओ-जिया के हिसाब में..

मैं था बुलंदी पर कभी 
छूकर ज़मीं जीता रहा
कभी ये रहा,कभी वो रहा 
और जिंदगी चलती रही .……
-मृदुला प्रधान
मूल रचना

Thursday, March 12, 2020

ऋतुराज वसंत की गलियन में ......... मृदुला प्रधान

यह कविता लगभग पच्चीस-तीस साल पहले, 
अपनी बेटियों को जगाने के लिए लिखी थी, 
हर साल वसंत- ऋतु में ज़रूर 
मन में घूमने लगती है.......

ऋतुराज वसंत की गलियन में
कोयल  रस-कूक   सुनावत हैं,
अधरों  पर   राग-विहाग लिए
अमरावाली  में,  इठलावट   हैं.
मधु-मदिरा पी, भ्रमरों के दल
कलियों  पर  जा  मंडरावत हैं,
मणि-माल लिए रश्मि-रथ पर
अब   भानु उदय को  आवत हैं . 
लखि   शोभा ऐसी  नैनन   सों
मृदु मन सबके   पुलकावत हैं,
पनघट जागी, जागी  चिड़िया
मेरी गुड़िया  भी  जागत हैं.
-मृदुला प्रधान
मूल रचना

Monday, February 3, 2020

एक आम गृहणी का, एक आम दिन.....मृदुला प्रधान

एक आम गृहणी का, एक आम दिन.......

कभी प्लेट और कभी 

थाली में,
कभी चेन और कभी 
बाली में,
कभी 'स्वीपर' में,कभी 
माली में,
तो.....कभी चाय की 
प्याली में.
कभी परदों में ,कभी 
कभी नाली में,कभी 
फूलों में, कभी 
डाली में 
या फिर......
खिड़की की जाली में.
कभी मिर्च-मसाले,
नमक-तेल,
चावल,रोटी की 
टोली में,
कभी स्कूलों की 
भाग-दौड़,
'कालेज' की हँसी 
ठिठोली में.
कभी दही,दूध और 
छाली में,कभी  
भीड़ 
और कभी ख़ाली में,
कभी प्रत्युष की 
उजियाली में,
कभी गोधूली की 
लाली में........