अंधेरे से कर प्रीति
उजाले सब दे दिये
अब न ढूंढना
उजालो में हमें कभी।
हम मिलेंगे सुरमई
शाम के घेरों में
विरह का आलाप ना छेड़ना
इंतजार की बेताबी में कभी।
नयन बदरी भरे
छलक न जाऐ मायूसी में
राहों पे निशां ना होंगे
मुड के न देखना कभी।
आहट पर न चौंकना
ना मौजूद होंगे हवाओं मे
अलविदा भी न कहना
शायद लौट आयें कभी।
-कुसुम कोठारी
