
तुमने लिखा था;
उस रात
खींचकर मेरा हाथ,
बना उंगली कलम से
प्यार नाम तुमने!
फ़ासला था हममें;
उस रात,
चारों ओर नीरवता
बेसुध सो रही थी।
तारिकाएँ ही जानती
दशा मेरे दिल की
उस रात।
मैं तुम्हारे पास होकर
दूर तुमसे जा रही थी।
अधजगा-सा, अलसाया-
अधसोया हुआ-सा मन,
उस रात।
तुमने खींच कर
मुझे अपनी ओर, फिर
से प्रस्ताव लिखा था,
साथ निभाने का जीवन
उस रात।
बिजली छूई तनमन को
सहसा जग कर देखा मैं
इस करवट पड़ी थी, तुम...
कि आँसू चुप बह रहे थे
उस रात।
जला दूँ उस संसार को
प्यार जो कायरता दिखाता,
पता.. उस समय क्या कर
और न कर गुज़रती मैं
उस रात।
प्रात ही की ओर को
हमेशा है रात चलती,
उजाले में अंधेरा डूबता,
शहर ही पूरा कि सारा
उस रात।
बदलता कौन? ऐसी
एक नया चेहरा सा
लगा लिया तुमने
था निशा का अद्भुत स्वप्न
उस रात।
मेरा पर ग़ज़ब का था
किया अधिकार तुमने।
और उतनी ही दूरियाँ..
पर, आज तक अन्तिम!
सौ बार मुड़ करके भी
न आये फिर कभी हम,
उस रात!
लौटा चाँद ना फिर कभी
और अपनी वेदना मैं,
आँखों की भाषा स्वयं
ख़ुद मुझमें बोलती हैं!!
-डॉ मधु त्रिवेदी