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Thursday, July 2, 2015

भरथरी गायक.............केशव तिवारी
















जाने कहां-कहां से
भटकते-भटकते
आ जाते हैं ये भरथरी गायक

कांधे पर अघारी
हाथ में चिकारा थामे
हमारे अच्छे दिनों की तरह ही ये
देर तक नहीं टिकते

पर जितनी देर भी रुकते हैं
झांक जाते हैं
आत्मा की गहराइयों तक

घुमन्तु-फिरन्तु ये 
जब टेरते हैं चिकारे पर
रानी पिंगला का दुःख
सब काम छोड़
दीवारों की ओट से 
चिपक जाती हैं स्त्रियां

यह वही समय होता है
जब आप सुन सकते हैं
समूची सृष्टि का विलाप

-केशव तिवारी
....तरंग से,15 मार्च