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Saturday, August 27, 2016

इश्क़ की सौग़ात बची रह गयी है...ज़िया फ़ारूक़ी



मेरी आँखों में जो थोड़ी सी नमी रह गयी है
बस यही इश्क़ की सौग़ात बची रह गयी है

वक़्त के साथ ही गुल हो गए वहशत के चराग़
एक स्याही है जो ताक़ों पे अभी रह गयी है

और कुछ देर ठहर ऐ मेरी बीनाई कि मैं
देख लूँ रूह में जो बखिया-गरी रह गयी है

आईनो तुम ही कहो क्या है मेरे होंटों पर
लोग कहते हैं कि फीकी से हंसी रह गयी है

बोझ सूरज का तो मैं कब का उतार आया मगर
धूप जो सर पे धरी थी, सो धरी रह गयी है

यूं तो इस घर के दर-ओ-बाम सभी टूट गए
हाँ मगर बीच की दीवार अभी रह गयी है
-ज़िया फ़ारूक़ी 
बीनाई = नज़र