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Wednesday, June 5, 2019

कविता तुम कहाँ हो .....प्रभांशु कुमार

कविता 
तुम कहाँ हो
कवि के हृदय में 
या काग़ज़ के पन्नों पर
या मन की संवेदना में 
या ऊष्मित होती वेदना में 
या बालाओं के रुदन में
या उद्वेगों के क्रन्दन में।
बताओ हो किसी की
स्मृतियों में 
या नायिकाओं के विरहगान में 
या छिपी हो सुर-ताल में 
या उलझी हो समुद्र के 
भँवर-जाल में।
बताओ तो छिपी कहाँ 
सुंदर सूरत में 
या अच्छी सीरत में 
या फिर चरित्र में 
आख़िर कहो तो 
हो बसती किसमें।
कहीं छिपी तो नहीं 
सैनिकों की ललकार में 
या मल्लाह के पतवार में
या नदी के बीच मझधार में 
या आन्दोलन से उपजे 
हाहाकार में।
कहाँ हो कविता
शब्दों के ताने-बाने में 
या कही गई जो बात 
अनजाने में 
पनघट पर पनिहारन के 
गुनगुनाने में 
या रंगीन परों वाली तितलियों के
उड़ जाने में।
कहाँ हो कविता 
आख़िर हो कहाँ 
मुझे तो लगता है
तुम हर जगह हो
हर किसी का सपना हो
या हो किसी के सपनों में।
हाँ तुम हो
वन की हरियाली में 
पर्वत, पहाड़ में 
कलकल करती झरने में
और हो कण-कण में 
जहाँ प्राण शेष है
अभी भी 
हाँ! अभी भी।
-प्रभांशु कुमार

Friday, May 26, 2017

वसुधैव कुटुम्बकम.................प्रभांशु कुमार


ना मुसलमान खतरे में है
ना हिन्दू खतरे में है
धर्म और मजहब से बँटता
इंसान खतरे में है

ना राम खतरे में है
ना रहमान खतरे में है
सियासत की भेंट चढ़ता
भाईचारा खतरे में है

ना कुरान खतरे में है
ना गीता खतरे में है
नफरत की दलीलों से
इन किताबों का ज्ञान खतरे में है

ना मस्जिद खतरे में है
ना मंदिर खतरे में है
सत्ता के लालची हाथों
इन दीवारों की बुनियाद खतरे में है

धर्म और मजहब का चश्मा
उतार कर देखो दोस्तों
अब तो हमारा
हिन्दुस्तान खतरे में है

-प्रभांशु कुमार
133/11ए अवतार टॉकीज के पीछे तेलियरगंज
इलाहाबाद- 211004
मो-7376347866