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Wednesday, February 14, 2018

नदी को सागर मिला नहीं है.....निर्मला कपिला

गिला-औ-शिकवा रहा नहीं है
मलाल फिर भी गया नहीं है

तलाश उसकी हुई न पूरी
नदी को सागर मिला नहीं है

बुला के मुझको किया जो रुसवा
ये बज़्म की तो अदा नहीं है

ये तो मुहब्बत लगी अलामत
अलील दिल की दवा नहीं है

गुलों के जैसे जिओ खुशी से
के ज़िंदगी का पता नहीं है

ग़रूर दौलत प किस लिए हो
ये धन किसी का सगा नहीं है

शरर ये नफरत का किसने फेंका
जो आज तक भी बुझा नहीं है

किसी को शीशा दिखा रहा जो
वो दूध का खुद धुला नहीं है

उलाहना दूं उसे जो निर्मल
यही तो मुझसे हुया नहीं है

- निर्मला कपिला

Friday, July 17, 2015

नहीं छोड पाता अपने पद चिन्ह.....निर्मला कपिला












नंगे पाँव चलते हुये
जंगल की पथरीली धरती पर
उलीक दिये कुछ पद चिन्ह
जो बन गये रास्ते
पीछे आने वालों के लिये
समय के साथ
चलते हुये जब से
सीख लिया उसने
कंक्रीट की सडकों पर चलना
तेज़ हो गयी उसकी रफ्तार
संभल कर, देख कर चलने की,
जमीं की अडचने, दुश्वारियाँ. काँटे कंकर
देखने की शायद जरूरत नही रही शायद
जमी पर पाँव टिका कर चलने का
शायद समय नहीं उसके पास
तभी तो वो अब
उलीच नही पाता
अपने पीछे कोई पद चिन्ह
नहीं छोड पाता अपनी पीढी के लिये
अपने कदमों के निशान

– निर्मला कपिला
...... बड़ी दीदी के ब्लाग से
http://www.hopesmagazine.in/?p=7484