
गिला-औ-शिकवा रहा नहीं है
मलाल फिर भी गया नहीं है
तलाश उसकी हुई न पूरी
नदी को सागर मिला नहीं है
बुला के मुझको किया जो रुसवा
ये बज़्म की तो अदा नहीं है
ये तो मुहब्बत लगी अलामत
अलील दिल की दवा नहीं है
गुलों के जैसे जिओ खुशी से
के ज़िंदगी का पता नहीं है
ग़रूर दौलत प किस लिए हो
ये धन किसी का सगा नहीं है
शरर ये नफरत का किसने फेंका
जो आज तक भी बुझा नहीं है
किसी को शीशा दिखा रहा जो
वो दूध का खुद धुला नहीं है
उलाहना दूं उसे जो निर्मल
यही तो मुझसे हुया नहीं है
- निर्मला कपिला
