
बिना किसी पूर्व-सूचना के
एक दिन आ गया प्रलय,
भौंचक्के रह गए सारे भविष्यवेत्ता,
सन्न रह गया समूचा मौसम-विभाग,
हहराता समुद्र लील गया सारा आकाश,
सूर्य डूब गया उसमें,
जिसकी फूली हुई लाश
बहती मिली दूर कहीं
कुछ समय बाद
चाँद और सितारे,
न जाने कहाँ बह गए
नामो-निशान तक नहीं मिला उनका।
वह तो मैं ही था कि
बच गया किसी तरह
तुम्हारे प्रेम-पत्रों की नाव बना कर;
वह तो तुम ही थी कि
बच गई किसी तरह
मेरे प्रेम-पत्रों के चप्पू चला कर।
समस्या यह है कि अब हम
अर्घ्य किसे देंगे
प्रतिदिन?
-सुशान्त प्रिय