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Monday, August 6, 2018

समस्या....सुशान्त प्रिय


बिना किसी पूर्व-सूचना के 
एक दिन आ गया प्रलय, 
भौंचक्के रह गए सारे भविष्यवेत्ता,
सन्न रह गया समूचा मौसम-विभाग, 
हहराता समुद्र लील गया सारा आकाश,
सूर्य डूब गया उसमें, 
जिसकी फूली हुई लाश 
बहती मिली दूर कहीं 
कुछ समय बाद 
चाँद और सितारे, 
न जाने कहाँ बह गए 
नामो-निशान तक नहीं मिला उनका। 

वह तो मैं ही था कि 
बच गया किसी तरह 
तुम्हारे प्रेम-पत्रों की नाव बना कर; 
वह तो तुम ही थी कि 
बच गई किसी तरह 
मेरे प्रेम-पत्रों के चप्पू चला कर।

समस्या यह है कि अब हम 
अर्घ्य किसे देंगे 
प्रतिदिन?
-सुशान्त प्रिय