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Thursday, October 11, 2018

उलझन.....देवेन्द्र सोनी

उलझन रहती है
सदा ही हमारे आसपास।

हर उलझन का होता है 
हल भी वहीं-कहीं
पर हमारा वैचारिक द्वंद्व 
करता है देर, इन्हें सुलझाने में।

उलझन का हमारी जिंदगी से
गहरा नाता है 
सुलझती है एक तो 
रहती है दूसरी हर दम तैयार।

उलझन, 
उपजाती है मन में नैराश्य 
पर सुलझते ही इसके 
प्रफुल्लित हो जाता है मन।

कई तरह की होती हैं
उलझनें
जो कई बार होती हैं
हमारे सोच के दायरे से बाहर।

अनायास उपजी इन उलझनों को 
सुलझाने का सरल उपाय 
यही लगता है मुझे -
बनें वैचारिक स्तर पर मजबूत
छोड़ें न धैर्य, दें दिलासा 
जूझते मन और तन को, क्योंकि -
उलझने करती हैं परेशान और
देती हैं कष्ट हमारे अंतस को।

सुलझ तो जाती ही हैं ये 
कभी न कभी पर 
ले लेती हैं हमारे आत्मबल की 
परीक्षा भी, ये उलझनें।

जब कभी हो जीवन में 
उलझनों से सामना हमारा
रखें धैर्य, न छोड़ें आत्म विश्वास।

जानते ही हैं यह हम 
सुलझ तो जाएंगी ही सभी उलझनें 
क्योंकि होती ही है ये - 
बहुधा सुलझने के लिए ।
-देवेन्द्र सोनी 

Tuesday, July 24, 2018

किस्मत से हम नहीं...देवेन्द्र सोनी

अक्सर ही हम
रोना रोते रहते हैं
अपनी फूटी किस्मत का
चाहे हमको मिला हो
कितना भी, अधिक क्यों न !

नही होता आत्म संतोष
कभी भी हमको
चाहते ही हैं -
और अधिक, और अधिक ।

ये कैसी चाहत है, सोचा है कभी !
मिलता है जितना भी हमको
वह सदा ही होता है
हमारी सामर्थ्य के अनुरूप।

मानना होगा इसे और
करना होगा संतोष
क्योंकि - वक्त से पहले और
किस्मत से ज्यादा नहीं मिलता
किसी को भी, कभी भी कुछ।

किस्मत भी बनाना पड़ता है -
सदैव कर्मरत रहकर।
कर्मों का यही हिसाब देता है
हमको वह फल, जो आता है
इस लोक और परलोक में
दोनों ही जगह काम।

बनती है जिससे फिर
नए जन्म की किस्मत हमारी।

समझ लें इसे और करें -
निरंतर मेहनत, सद्कर्म ।

खें संतोष, मानकर यह
किस्मत से हम नहीं
हमसे है किस्मत।
-देवेन्द्र सोनी