जीना भी इक मुश्किल फन है
सबके बस की बात नहीं
कुछ तूफान ज़मीं से हारे,
कुछ क़तरे तूफ़ान हुए
अपना हाल न देखे कैसे, सहरा भी आईना है
नाहक़ हमने घर को छोड़ा, नाहक़ हम हैरान हुए
दिल की वीरानी से ज्यादा मुझको
है इस बात का ग़म
तुमने वो घर कैसे लुटा
जिस घर में मेहमान हुए
लोरी गाकर जिनको सुलाती थी दिवाने की वहशत
वो घर तनहा जाग रहे है, वो कुचे वीरान हुए
कितना बेबस कर देती है
शोहरत की जंजीरे भी
अब जो चाहे बात बना ले
हम इतने आसान हुए
- डॉ. राही मासूम रजा

