कुछ तो पाया है मिरे दिल ने तेरे जाने में।
रात भर रोए थे, कुछ मोतियों को पाने में।।
फिर न कहना कि मुझे दोस्तों का मोल नहीं,
उम्र गुज़री है, तेरी दोस्ती भुलाने में।।
तुमने पूछा ही नहीं मुझसे मेरा हाल-ए-जिगर,
मैं बताने तो गया था, तिरे बुलाने में।।
कैसे कह दूं कि तेरा साथ मुझको ख़ास नहीं,
ख़ुद को भूले हुए हैं हम, क़रीब लाने में।।
झुकती उठती है नज़र इक नज़र चुराने को,
जा के आती है, हमें साँस फिर ज़माने में।।
झूठ सब बातें हुई, बेख़ौफ़, मगर चूँ न हुई,
कितना कोहराम मचा है, ये सच बताने में।।
-विनीता तिवारी

