मैंने पूजा की
अचर्ना की, और
भगवान प्रसन्न हुए।
बोले,
वत्सला, कुछ माँगो।
अविलम्ब, मैंने माँग लिया
मुझे पंख चाहिए
भगवान तथास्तु बोल कर
तत्काल अन्तर्धान हो गए
मैने ख़ुशी से सब को
बातें अपनी बतलायी
सबने मुझे मूर्ख समझा
और मेरी खिल्ली उड़ायी।
नासमझ!
मुझे ही बुला लिया होता!
धन-वैभव का समान माँग लिया होता!
सब की सुन रही थी
और मन ही मन
इन प्रश्नों का जाल बुन रही थी।
कब करेगा ये समाज
मेरे आन्तरिक गुणों का मूल्यांकन?
नारी हूँ मैं।
आकाश दिख रहा है
विस्तार देख लेंगें
अब पंख मिल गये हैं
उड़ान भर लेंगें !!!!!!!!

वीणा पांडे, जमशेदपुर
स्नातक (साहित्य अलंकार)
binu1247@gmail.com
अचर्ना की, और
भगवान प्रसन्न हुए।
बोले,
वत्सला, कुछ माँगो।
अविलम्ब, मैंने माँग लिया
मुझे पंख चाहिए
भगवान तथास्तु बोल कर
तत्काल अन्तर्धान हो गए
मैने ख़ुशी से सब को
बातें अपनी बतलायी
सबने मुझे मूर्ख समझा
और मेरी खिल्ली उड़ायी।
नासमझ!
मुझे ही बुला लिया होता!
धन-वैभव का समान माँग लिया होता!
सब की सुन रही थी
और मन ही मन
इन प्रश्नों का जाल बुन रही थी।
कब करेगा ये समाज
मेरे आन्तरिक गुणों का मूल्यांकन?
नारी हूँ मैं।
आकाश दिख रहा है
विस्तार देख लेंगें
अब पंख मिल गये हैं
उड़ान भर लेंगें !!!!!!!!

वीणा पांडे, जमशेदपुर
स्नातक (साहित्य अलंकार)
binu1247@gmail.com