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Sunday, December 17, 2017

मानवता


लिख रहे हैं आप
मानवता पर
लिखिए
जी चाहे
जितना हो
स्याही कलम में
खतम हो जाए 
तो और भर लो
कलम को सियाही से
सोचकर जितना
अच्छा लिखना हो
लिख डाले..और
करते रहो
प्रतीक्षा...
उसी मानवता की
जिसकी बाट आप
जोह रहे हैं
आनेवाली हर गाड़ी
देख लो...सब आएँगे
पर ,,,,,,मानवता
जिसकी तुम्हें प्रतीक्षा है
वो तो कबकी
निवाला बन चुकी है
आराम फरमा रही है
पेट में...
नेताओं और आतंकियों
के....पर
हजम नहीं हुई अबतक
यशोदा ..
मन की उपज

Thursday, November 2, 2017

पुनः और पुनः ....

लिखी जाती है कविता... 
किसी कवि की कलम से... 
उतरती है सियाही कागज पर..
पूरी होती जब वो कविता...
पढ़ता है कवि उसे और 
उस बदनसीब कागज को 
फेंक देता है..
बनाकर लड्डू जैसा गोल,,,,
सोचता है कुछ 
फिर उठाकर उस 
लड्डू को...
खोलकर एतिहात से...
पढ़ता है 
पुनः और पुनः ....
उतारता है उस कविता को...
कागज एक नया लेकर..
फिर लिखता है कुछ... 
चेहरे पर उसके 
मुस्कान एक 
छोटी सी आती है....
सहेज लेता है उसे..
सोचता है...
तसल्ली है उसे..
पूरी हो गई ये कविता..
नहीं है परवाह उसे...
कि क्या सोचेगा..
पढ़ने वाला उस
कविता को...उसे 
इस बात की... 
कतई नहीं है चिन्ता
क्योंकि जानता है वह 
कि यह कविता उसने
लिखी ही है... 
अपने आप के लिए..
-मन की उपज

Saturday, September 16, 2017

सुख या फिर ख़ुशी..


चुनते हैं हम
सुख या फिर
ख़ुशी..
रह कर भी
शिविर में ..
प्रताड़नाओं के
हम मन के
मौसम को... 
बासन्ती बना सकते हैं
कोई इन्सान..
कोई वस्तु 
या फिर 
प्रक्रिया हो 
कोई भी....
इतनी बलशाली नहीं
कि हमारे मन पर
कब्ज़ा कर सके
वो भी बगैर हमारी 
मर्जी....और हम
मन से..करते हैं 
कोशिश...और
तलाश लेतें हैं
खुशियाँ...
-मन की उपज
#हिन्दी दिवस

Saturday, August 12, 2017

फिर...आपकी देह के इर्द-गिर्द... मन की उपज


जब आप बीमार रहते हैं तो 
बना रहता है हुजूम
तीमारदारों का 
और ये.. 
वो ही रहते हैं 
जिनकी बीमारी में...
आपने चिकित्सा व्यवस्था 
करवाई थी 
पर भगवान न करे...
आपकी मृत्यु हो गई 
तो...वे 
आपको आपके घर तक 
पहुंचा भी देंगे..
और फिर...
....आपकी देह के 
इर्द-गिर्द... 
रिश्तेदारों का 
जमावड़ा शुरु हो जाएगा...
कुछ ये जानने की 
कोशिश में रहेंगे कि 
हमें कुछ दे गया या नहीं....
यदि नहीं तो... 
आस लग जाती है 
घर के बचे लोगों से 
कि निशानी को तौर पर 
क्या कुछ मिलेगा..
पर डटे रहते हैं 
पूरे तेरह दिन तक...
-मन की उपज

Friday, July 7, 2017

अवलोकन.....








लिखी जाती है कविता
कवि की भावनाएँ रहती है
समाहित जिसमें
उस कविता को पाठक पढ़ता है तो
उसमें  प्रयास करता है...
ढूंढने का भाव, कवि का
पर नहीं आता है समझ
फिर देखता है
उतार-चढ़ाव
शब्द-विन्यास
प्रेम भाव....
और मर्म साथ में
धर्म भी..
असफल होने पर
फिर तलाशता है
अर्थ दूसरा ..
उस कविता में..
अंत में देखता है
कवि का नाम..
यदि कवि ख्याति प्राप्त है
तो प्रतिक्रिया देगा...

यदि कोई चलताऊ
कवि हो तो...
लिखेगा...लगे रहो

सादर...





Thursday, April 13, 2017

और खूब पढ़ती हूँ....मैं










पढ़ती हूँ
और खूब पढ़ती हूँ....
चार ई-पत्रिकाएँ आती है
अखबार भी पढ़ती हूँ..

ये सोचकर कि
लिखना आ जाएगा
किसी ने कहा है कि
एक अच्छा पाठक भी

लेखक बन सकता है
पर अफसोस....
आते हैं भाव मन में
बस..आते ही

दो पंक्तियों में ही 
सिमट जाते हैं...
चार डायरियों के
पृष्ठ दो-दो पंक्तियो से 

भर गई है..
उन सबको जोड़कर भी देखा...
पर कविता को न बनना था
सो नहीं बनी....

ऐसा लगता है कि
भाग्य में सिर्फ और सिर्फ
संग्रहण,संयोजन
और संम्पादन ही
लिखा है...

मन की उपज..
यशोदा

डायरी में लिखी दो पंक्तिया..
आज तक रखे हैं पछतावे की अलमारी में,
एक दो वादे जो दोनों से निभाये ना गए…





Saturday, May 7, 2016

मदर्स डे....यशोदा










मदर्स डे....
लो आ गया फिर से
मदर्स डे
यद्यपि है तो ये
पाश्चात्य परम्परा....
उन्होंने ही...
किसी को महत्वपूर्ण जताने
साल का एक दिन..
उसके नाम कर दिया
परन्तु......
इसके विपरीत
अपने भारत में....
वर्ष का पूरा तीन सौ पैंसठ दिन
माँ के नाम ही तो है
सीमित नहीं यहाँ तक भी
जो भी देता है जीवन
और ज़रूरी है जीवन के लिए
उसे भी माँ की कोटि में
गिना जाता है
माता तो धरती भी है..
जो अपना सीना चीर कर 
अन्न देती है
माता भारत भी है...
जिसकी जय-जयकार 
हम नित्य करते हैं..
गाय तो माता कहलाती ही है
पतित पावनी गंगा-जमुना
भी माताएँ ही हैं....
........................पर 
ये तो भारत है.....
सम्मान के साथ-साथ..
दुर्व्यवहार भी होता रहता है
माता का सदा-सर्वदा

मन की उपज
-यशोदा

Wednesday, January 6, 2016

सात शहीद...यशोदा



चले गए वो क्यों
क्या दुश्मनी थी उनसे
जो मार दिया छल से
जो चाहते हैं वो
वो होगा जरूर
पर उन्हे... 
देनी होगी तिलाजली
हथियार के रूप में
और सरकार से
विनम्र आग्रह
तलाशें..उन सफेदपोशों
और सरकारी अमले में से
विभीषणों और जयचंदों  को
जो इन आतंकवादियों को 
खबरें मुहैय्या  करवाते हैं
व पनाह भी देते हैं
और तभी..
भारत की जनता
मरते-मरते जीने के
भय से मुक्त होगी
मन की उपज

-यशोदा    
                                                                                                                                                                        
        

Saturday, August 29, 2015

सोचिए ज़रा...यशोदा

हार्दिक पटेल...

लोगों का हुजूम

टूट पड़ा है

हर कोई बनना चाहता है

हार्दिक पटेल


क्यों नहीं है ख्वाहिश

बनने की

पार्थिव पटेल


क्यों नहीं बनना चाहते

अक्षर पटेल..

जिसने कल 

भारत का नाम

रौशन किया


सोचिए ज़रा...

इस दिशा में भी

-यशोदा

Sunday, August 16, 2015

लोग भी कमाल करते हैं…यशोदा












यूं तो
बेरंग हैं पानी 
फिर भी जिन्दगी 
कहलाती हैं,

ढेर सारे रंग हैं 
शराब के फिर भी 
गन्दगी कहलाती हैं।।

लोग भी कमाल करते हैं…

जिन्दगी के गम 
भुलाने के लिये, 
गन्दगी में जिन्दगी 
मिलाकर पीते हैं…

- मन की उपज

Sunday, September 28, 2014

अहिल्या को नहीं भुगतना पड़ेगा..........यशोदा



















विडम्बना
यही है की
स्वतंत्र भारत में
नारी का
बाजारीकरण किया जा रहा है,

प्रसाधन की गुलामी,
कामुक समप्रेषण
और विज्ञापनों के जरिये
उसका..........
व्यावसायिक उपयोग
किया जा रहा है.

कभी अंग भंगिमाओं से,
कभी स्पर्श से,
कभी योवन से तो
कभी सहवास से
कितने भयंकर परिणाम
विकृतियों के रूप में
सामने आए हैं,

यही नही
अनाचार के बाद
जिन्दा जला देने
जैसी निर्ममता से
किसी की रूह
तक नहीं कांपती

क्यों....क्यों..
आज भी
पुरुषों के लिये
खुले दरवाजे

और....और..
स्त्रियों के लिये
उफ.......
कोई रोशनदान तक नहीं?

मैं कहती हूँ....
स्त्री नारी होती नहीं
बनाई जाती है.

हम सबको
अब यह संकल्प लेना होगा
कि अब और नहीं..
कतई नहीं,
अब किसी इन्द्र के
पाप का दण्ड
अब किसी भी
अहिल्या को
नहीं भुगतना पड़ेगा

मन की उपज
-यशोदा

Thursday, September 25, 2014

कैसा-कैसा दर्द रिसता है..........यशोदा

 











विचित्र है..
और सत्य भी तो है,
कि हजारों वर्ष के
इतिहास नें कभी भी,
किसी ने भी
नारी की आर्थिक स्थिति की
ओर ध्यान ही नहीं दिया

और .......
इसी के चलते
देश की बेटियां,
बहनें और माताओं को
इसी अर्थव्यवस्था
के चलते समाज में
हीन भावनाओं और
दासत्व से ग्रषित ही रही.

दासप्रथा के मूल में
नारी के प्रति
असहिष्णुता ही है
और यह
सामाजिक सोच है
जो स्त्रियों और पुरुषों को
अलग अलग नियमों के
खाकों में जकड़ देती है
और पुरुष कभी
देख और सुन ही नहीं पाता

और..........
वहीं स्त्री भीतर
कितना और
कैसा-कैसा दर्द रिसता है,
इसकी भावनात्मक वेदना
तो दूर मानवता के नाते
गहरी संवेदना भी
नहीं उपजती
जो की.....
उपजनी चाहिये

मन की उपज
-यशोदा

Friday, August 15, 2014

यही तो होता आया है....यशोदा





 

आज दूसरा दिन है
आजादी का
आज से सड़सठ साल पहले
भी यही सोचा था
हमने कि
अब हम आजाद हैं

पर कहां
मिली है आजादी हमें
हम नहीं दे सकते
सजा उनको
जिसने हमारे साथ
ज्यादतियां की थी

वे अधीन हो जाते हैं
न्यायालय के
जहां उन्हें भरपूर
समय मिल जाता है
अपने बचाव का
सालों लग जाते हैं
तहकीकात में

और तो और
उसके साथ
ज्यादतियां होती ही रहती है
राह चलते,
सामाजिक तानों,
अपनों और परायों की
तीखी नज़रें
और अपनी ओर 

उठती उँगली से लगातार....
की जाती है
ज्यादतियां उस पर

एक बार ज्यादती हुई तो हो गयी
पर............. ये रोज की
ज्यादतियां असहनीय हो जाती है


ऐसे में वो
क्या भी करे?
या तो लटक जाए
जल जाए
या फिर
डूब जाए..
अंततः होता यही आया है

मन की उपज
-यशोदा