Showing posts with label रंजना डीन. Show all posts
Showing posts with label रंजना डीन. Show all posts

Saturday, February 8, 2020

पुराने दर्द.......रंजना डीन

कई बार उभर आते हैं 
पुराने दर्द
और हम भूल जाते हैं
की ये चोट लगी कैसे थी
फिर कोई मिलता जुलता 
इत्तफाक
याद दिला देता है उस चोट की
और हम वही मरहम
बता देते हैं उसे
जिसने नयी नयी खायी है 
वो चोट
और इस तरह
हम न सही कोई और सही
बच जाता है
दर्द भरे लम्बे एहसासों से



Saturday, February 1, 2020

रिसती दीवार.... रंजना डीन

सीलन से यूँ ही नहीं गिर जाती 
दीवारें 
बहुत दिनों तक खुद में ही
समेटती, सहेजती रहती है 
नमी को 
संभालती रहती हैं हर कमी को 
पर जब ये नमी उभर आती है 
बूँदें बन कर सीली हुई दीवारों पर 
फिसलती हैं लकीर बनकर 
किनारों पर 
तब हमदर्दी की धूप की गर्मी 
मीठे से लफ़्ज़ों की नरमी 
अगर सुखा ले गयी ये सीलन 
तो फिर जी उठता है सहने का जज्बा
वर्ना किसी दिन यूँ ही
घावों सी रिसती दीवार
दम तोड़कर ढह जाती है