Monday, June 1, 2020

चार दिन की ज़िन्दगी है


आज समय नहीं मिला रचना चुनने का
अपनी डिजिटल डायरी से एक तोड़-मरोड़


न चादर बड़ी कीजिये,

न ख्वाहिशें दफन कीजिये,
चार दिन की ज़िन्दगी है,
बस चैन से बसर कीजिये...

न परेशान किसी को कीजिये,
न हैरान किसी को कीजिये,
कोई लाख गलत भी बोले,
बस मुस्कुरा कर छोड़ दीजिये...

न रूठा किसी से कीजिये,
न रूठा किसी को रहने दीजिए,
कुछ फुरसत के पल निकालिये,
कभी खुद से भी मिला कीजिये...

Sunday, May 31, 2020

इश्क है मेहमान दिल में ...अरुणिमा सक्सेना

वज़्न   2122.   2122.   212
मतला

रस्मे उल्फत है गवारा क्यों नहीं
दर्द है दिल का सहारा क्यों नहीं ।।

लाड़ से उसने निहारा क्यों नहीं
और नज़रों का इशारा क्यों नहीं ।।

इश्क मे ऐसा अजब दस्तूर है
वो किसी का है हमारा क्यों नहीं ।।

प्यार से उसने लगाया जब गले
आपने देखा नज़ारा क्यों नहीं .।।

आंख नम है गर्म सांसे किसलिए
दर्द का दिल में शरारा क्यों नहीं ।।

इश्क है मेहमान दिल में आज भी
प्यार कम है पर ज़ियादा क्यों नहीं ।।

जा रहा था राह से मेरी मगर
प्यार से उसने पुकारा क्यों नहीं।।

-अरुणिमा सक्सेना
28. 05. 20

Saturday, May 30, 2020

कुछ तो असर था मेरी चाहतों में ...नामालूम

हवाओं सा जब से वो छू कर गया है 
मेरी रूह तक को वो महका गया है 

सजाया है किसने "अयान" मेरे घर को 
मेरे अंगना ये कौन आ गया है 

कुछ ऐसे है रौशन तेरे नूर से हम 
यूँ लगता है दिल मे खुदा आ गया है 

महफ़िल सी ले के मेरे जहन ओ दिल मे 
तेरी यादों का कारवां आ गया है 

कुछ तो असर था मेरी चाहतों में 
वो हो के सब से जुदा आ गया है.
-नामालूम

Friday, May 29, 2020

समय की शिला पर ....शम्भुनाथ सिंह

समय की शिला पर मधुर चित्र कितने
किसी ने बनाये, किसी ने मिटाये।

किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी
किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूंद पानी
इसी में गये बीत दिन ज़िन्दगी के
गयी घुल जवानी, गयी मिट निशानी।
विकल सिन्धु के साध के मेघ कितने
धरा ने उठाये, गगन ने गिराये।

शलभ ने शिखा को सदा ध्येय माना,
किसी को लगा यह मरण का बहाना,
शलभ जल न पाया, शलभ मिट न पाया
तिमिर में उसे पर मिला क्या ठिकाना?
प्रणय-पंथ पर प्राण के दीप कितने
मिलन ने जलाये, विरह ने बुझाये।

भटकती हुई राह में वंचना की
रुकी श्रांत हो जब लहर चेतना की
तिमिर-आवरण ज्योति का वर बना तब
कि टूटी तभी श्रृंखला साधना की।
नयन-प्राण में रूप के स्वप्न कितने
निशा ने जगाये, उषा ने सुलाये।

सुरभि की अनिल-पंख पर मौन भाषा
उड़ी, वंदना की जगी सुप्त आशा
नहीं बुझ सकी अर्चना की पिपासा।
किसी के चरण पर वरण-फूल कितने
लता ने चढ़ाये, लहर ने बहाये।
- शम्भुनाथ सिंह
मूल रचना


जरा बता दो है क्या ...प्रीती श्रीवास्तव

बहुत ग़ज़ल से मुहब्बत वो करतें हैं यारों
उसी में शामों सहर रंग भरतें हैं यारों।।

नजर उठी मेरी उनकी तरफ देखा उन्हें।
वो करते इश्क से दीदार डरतें हैं यारों।।

कोई बता दो मेरी आरजू उन्हें जाकर।
लिखा है खत में कि वो आहें भरतें हैं यारों।।

करूं मैं कैसे यूं दीदार अपने साहिब का।
वो तो नकाब हटातें भी डरतें हैं यारों।।

खुदा ही जाने मुहब्बत में क्या होगा मेरा।
देखा है लोग होकर खाक मरतें हैं यारों।।

जरा बता दो है क्या हाथ की लकीरों में।
ये सच है इश्क तो उन्ही से करतें हैं यारों।।
-प्रीती श्रीवास्तव

Thursday, May 28, 2020

मैं स्त्री हूं ...उमा त्रिलोक


दहेज में मिला है मुझे
एक बड़ा संदूक हिदायतों का
आसमानी साड़ी में लिपटा हुआ संतोष
सतरंगी ओढ़नी में बंधी सहनशीलता
गांठ में बांध दिया था मां ने
आशीष,
"अपने घर बसना और....
विदा होना वहीं से "

फिर चलते चलते रोक कर कहा था
"सुनो,
किसी महत्वाकांक्षा को मत पालना
जो मिले स्वीकारना
जो ना मिले
उसे अपनी नियति मान लेना
बस चुप रहना
सेवा और बलिदान को ही धर्म जानना "
और
कहा था

"तेरी श्रृंगार पिटारी में
सुर्खी की जगह
लाल कपड़े में बांध कर मैंने
रख दिया है
" मीठा बोल "
बस उसे ही श्रृंगार मानना
और
चुप रहना

मां ने इतना कुछ दिया
मगर भूल गई देना मुझे
अन्याय से लडने का मंत्र
और
मैं भी पूछना भूल गई
कि
यदि सीता की तरह, वह मेरा
परित्याग कर दे
तो भी क्या मैं चुप रहूं
और यदि द्रौपदी की तरह
बेइज्जत की जाऊं
क्या, तो भी

क्या,
दे दूं उसे हक
कि
वह मुझे उपभोक्ता वस्तु समझे
लतादे मारे, प्रताड़े

क्या
उसके छल कपट को अनदेखा कर दूं
समझौता कर लूं
उस की व्यभिचारिता से
पायदान की तरह पड़ी रहूं
सहती सब कुछ
फिर भी ना बोलूं
अन्याय के आगे
झुक जायूं

मां
अगर ऐसा करूंगी तो फिर किस
स्वाभिमान से
अपने बच्चों को
बुरे भले की पहचान करवाऊंगी
किस मुंह से उन्हें
यातना और अन्याय के आगे
न झुकने का पाठ पढ़ाऊंगी

मां
"मुझे अपनी अस्मिता की
रक्षा करनी है"

"सदियों से
स्त्री का छीना गया है हक
कभी उसके होने का हक
कभी उसके जीने का हक
बस अब और नहीं"

अब तो उसने
विवशता के बंधनों से जूझते जूझते
गाड़ दिए हैं
अनेकों झंडे
लहरा दिए हैं
सफलताओं के कई परचम

मां
अब तो कहो मुझ से
कि कोशिश करूं मैं
सृष्टि का यह विधान

क्यों कि नहीं जीना है मुझे
इस हारी सोच की व्यथा के साथ
"मुझे जीना है
हंस ध्वनि सा
गुनगुनाता जीवन
गीत सा लहराता जीवन"

मैं स्त्री हूं

-उमा त्रिलोक


Wednesday, May 27, 2020

शलभ मैं शापमय वर हूँ! ...महादेवी वर्मा

शलभ मैं शापमय वर हूँ !
किसी का दीप निष्ठुर हूँ !

ताज है जलती शिखा
चिनगारियाँ शृंगारमाला;
ज्वाल अक्षय कोष सी
अंगार मेरी रंगशाला;
नाश में जीवित किसी की साध सुंदर हूँ !

नयन में रह किंतु जलती
पुतलियाँ आगार होंगी;
प्राण मैं कैसे बसाऊँ
कठिन अग्नि-समाधि होगी;
फिर कहाँ पालूँ तुझे मैं मृत्यु-मंदिर हूँ!

हो रहे झर कर दृगों से
अग्नि-कण भी क्षार शीतल;
पिघलते उर से निकल
निश्वास बनते धूम श्यामल;
एक ज्वाला के बिना मैं राख का घर हूँ !

कौन आया था न जाना
स्वप्न में मुझको जगाने;
याद में उन अँगुलियों के
है मुझे पर युग बिताने;
रात के उर में दिवस की चाह का शर हूँ !

शून्य मेरा जन्म था
अवसान है मूझको सबेरा;
प्राण आकुल के लिए
संगी मिला केवल अँधेरा;
मिलन का मत नाम ले मैं विरह में चिर हूँ !
महादेवी वर्मा  MAHADEVI VARMA
-महादेवी वर्मा
मूल रचना