Tuesday, June 25, 2019

समझौतों की कोई जु़बान नहीं होती...सीमा सिंघल सदा


तल्‍लीन चेहरों का सच 
कभी पढ़कर देखना 
कितने ही घुमावदार रास्‍तों पर 
होता हुआ यह 
सरपट दौड़ता है मन 
हैरान रह जाती हूँ कई बार 
इस रफ्त़ार से
 .... 

अच्‍छा लगता है शांत दिखना 
पर कितना मुश्किल होता है 
भीतर से शांत होना 
उतनी ही उथल-पुथल 
उतनी ही भागमभाग 
जितनी हम 
किसी व्‍यस्‍त ट्रैफि़क के 
बीच खुद को खड़ा पाते हैं . 
समझौतों की कोई जु़बान नहीं होती 
फिर भी वे हल कर लेते 
हर मुश्किल को !!!
लेखक परिचय - सीमा सिंघल सदा 

Monday, June 24, 2019

मुहब्बत का श्री गणेश.....नवीन मणि त्रिपाठी

2122 2122 212

हुस्न का बेहतर नज़ारा चाहिए ।
कुछ तो जीने का सहारा चाहिए ।।

हो मुहब्बत का यहां पर श्री गणेश ।
आप का बस इक इशारा चाहिए ।।

हैं टिके रिश्ते सभी दौलत पे जब ।
आपको भी क्या गुजारा चाहिए ।।

है किसी तूफ़ान की आहट यहां ।
कश्तियों को अब किनारा चाहिए ।।

चाँद कायम रह सके जलवा तेरा ।
आसमा में हर सितारा चाहिए ।।

फर्ज उनका है तुम्हें वो काम दें ।
वोट जिनको भी तुम्हारा चाहिए ।।

अब न लॉलीपॉप की चर्चा करें ।
सिर्फ हमको हक़ हमारा चाहिए ।।

कब तलक लुटता रहे इंसान यह ।
अब तरक्की वाली धारा चाहिए ।।

जात मजहब।से जरा ऊपर उठो ।
हर जुबाँ पर ये ही नारा चाहिए ।।

अम्न को घर में जला देगा कोई ।
नफरतों का इक शरारा चाहिए ।।
- नवीन मणि त्रिपाठी
शब्दार्थ - शरारा - चिंगारी 


Sunday, June 23, 2019

पास बैठो तुम...रश्मि शर्मा


आओ न

पास बैठो तुम
तुम्‍हारे मौन में
मैं वो शब्‍द सुनूंगी
जो जुबां कहती नहीं
दि‍ल कहता है तुम्‍हारा....

आओ न

फि‍र कभी मेरे इंतजार में
तुम तन्‍हा उदास बैठो
और दूर खड़ी होकर
मैं तुम्‍हारी बेचैनी देखूंगी...

आओ न...

मि‍ल जाओ कभी
राहों में बाहें फैलाए
मैं नि‍कल जाऊँगी कतराकर मगर
खुद को उनमें समाया देखूंगी......

आओ न...

फि‍र से अजनबी बनकर
मेरा रास्‍ता रोको..मुझसे बात करो
मुझे लेकर दूर कहीं नि‍कल जाओ
वादा है मेरा, झपकने न दूंगी पलकें
बस, तुममें ही डूबकर जिंदगी बसर करूंगी......।

Saturday, June 22, 2019

ज़िंदगी और मौत ....इन्द्रा

मौत ने पूछा
ज़िंदगी एक छलावा है
एक झूठ है
हर दिन हर पल तुम्हारा साथ छोड़ती जाती है
फिर भी तुम उसे प्यार करते हो
मैं एक सच्चाई हूँ अंत तक तुम्हारा साथ निभाती हूँ
पर फिर भी तुम मुझसे नफरत करते हो
मुझसे डरते हो
मुझसे समझौता कर लो
फिर कोई डर तुम्हें डरा न पायेगा
मैंने कहा
तुम सत्य हो शाश्वत हो
अनिवार्य हो
पर तुमसे कैसे समझौता करलूं
तुम्हारी टाइमिंग बहुत गलत होती है
तुम गलत समय पर गलत लोगों को ले जाती हो
तुम गलत समय पर गलत तरीके से आती हो
पूछो उन बदनसीब अभिवावकों से
जिन्होंने खोय अपने लाल असमय
पूछो उन से ,
जिन्होंने ने गवाए अपने परिजन
आतंकवादियों के हाथों
उम्र थी जान गवाने की
फिर जो मजबूर, पीड़ित , बीमार
मरने की प्रार्थना करते हैं
उन्हें तुम तड़पने को छोड़ देती हो
बच्चों ,जवानों को अपना शिकार बनाती हो
कैसे करलूं तुमसे समझौता
तुम कड़वा सच हो, अनिवार्य हो पर
न्यायसंगत नहीं
काम से काम मेरी नज़र में तो नहीं
ज़िन्दगी लाख छलावा सही
मीठा झूठ सही
पर सुन्दर है जीने का,
लड़ने का हौसला देती है

-इन्द्रा


Friday, June 21, 2019

ज़माने का चलन .....डॉ. ऋचा सत्यार्थी

हर दिशा में लम्हा-लम्हा बो गया है
कह के हमसे अलविदा वह जो गया है

कर लिए सूरज से समझौते घटा ने
उजली सुबह का वादा सो गया है

इस शहर में ख़ुशनुमा है आज मौसम
यह समां रंगीन, लेकिन, खो गया है

था किनारे का हंसी मंज़र छलावा
गम के सागर में डुबो हमको गया है

दुश्मनों से प्यार, नफ़रत दोस्तों से
यह ज़माने का चलन हो गया है

-डॉ. ऋचा सत्यार्थी

Thursday, June 20, 2019

कुछ शेर हवाओं के नाम …मंजू मिश्रा

हवाओं की..  कोई सरहद नहीं होती
ये तो सबकी हैं बेलौस बहा करती हैं
**
हवाएँ हैं, ये कब किसी से डरती हैं
जहाँ भी चाहें बेख़ौफ़ चला करती हैं
**
चाहो तो कोशिश कर के देख लो मगर
बड़ी ज़िद्दी हैं कहाँ किसी की सुनती हैं
**
हवाएँ न हों तो क़ायनात चल नहीं सकती 
इन्ही की इनायत है कि जिंदगी धड़कती है 
- मंजू मिश्रा
बेलौस - निस्वार्थ, बिना किसी भेदभाव के

Wednesday, June 19, 2019

जीवन बड़ा रचनाकार है ....राहुलदेव गौतम

जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।
असत्य के शब्दों से,
सत्य का अर्थ रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जो कभी शाश्वत हुआ न हो,
ऐसे कल्पनाओं का भरमार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जो बिखरा हुआ है,
ख़ुद ज़िम्मेदारियों के शृंखला में,
वो टूटे हुए सपनों का हार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

फँस जाते है स्वयं इसमें,
लक्ष्यों का अरमान,
ऐसे जालों का जंजाल रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

ख़ुद में खो जाता है,
ख़ुद में पा जाता है,
ऐसे इच्छाओं का संसार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जिससे मतलब की बात निकले,
जितना जिससे परिहास निकले,
ऐसे शख़्सों का अम्बार रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

पल में रूप,
पल स्वरूप,
ऐसे सच-झूठ का नक़ाब बुनता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।

जितना घावों में ठीक लगे,
उतना ही गुनगुना लेता है,
ऐसे ही नग़मों की आवाज़ रचता है।
जीवन क्षण-क्षण,
स्वांग रचता है।
-राहुलदेव गौतम