Friday, February 12, 2021

मै भारत-भूमि ! ...मंजू मिश्रा

मै भारत-भूमि !
ना जाने कब से
ढूंढ रही हूँ
अपने हिस्से की
रोशनी का टुकड़ा….
लेकिन पता नहीं क्यो
भ्रष्ट अवव्यस्था के ये अँधेरे
इतने गहरे हैं
कि फ़िर फ़िर टकरा जाती हूँ
अंधी गुफा की दीवारों से…
बाहर निकल ही नहीं पाती
इन जंजीरों से,
जिसमे मुझे जकड़ कर रखा है
मेरी ही संतानों ने

उन संतानों ने
जिनके पूर्वजों ने
लगा दी थी
जान की बाज़ी
मेरी आत्मा को
विदेशियों की चंगुल से
मुक्त कराने के लिए

हँसते हँसते
खेल गए जान पर
शहीद हो गये
माँ की आन पर
एक वो थे
जिनके लिए
देश सब कुछ था
देश की आजादी
सबसे बड़ी थी
एक ये हैं
जिनके लिए
देश कुछ भी नहीं
देश का मान सम्मान
कुछ भी नहीं
बस कुछ है तो
अपना स्वार्थ,
अपनी सम्पन्नता और
अपनी सत्ता ……

-मंजू मिश्रा


Thursday, February 11, 2021

मैं अदना नारी .....नीलम गुप्ता

मैं अदना नारी
सब कहते है कैसे लिख लेती हो
कितना हुनर है
मैं मुस्करा जाती हूं
और तुम्हें एक राज बताती हूं
लिखने को हुनर नही दिल चाहिए
शब्द नही समझ चाहिए
कोई कहानी नहीं
बस दर्द चाहिएं
कोई बनावट नही
असलियत चाहिएं

कौन क्या लिखता
कैसे लिखता
मैं नही जानती
बस दिल ने जो कहा
मैं बस वहीं  मानती 

कोई जादू नहीं है ये
ना कोई काबिलियत हैं ये
बस जज्बात से भरा दिल हैं
जिसे आपके समझ में उभारती
बिना जज्बात के बात नहीं बनती
बात बिन कायनात नही रचती

फिर मैं तो कलमकार हूं दोस्तों
जज्बात बिन मेरी
कलम भी ना हिलती
कुछ अनकहे ख्याब
कुछ सबके विचार
कुछ नादानियां
कुछ खामोशियां
कुछ अधूरा प्यार
कभी मां का दुलार
तो कभी हसीं की बौछार ले आती हूं
और अंदर तक भाव भिवोर हो जाती हूं

मैं एक अदना सी नारी
लिख कर कुछ जज़्बात
खुशियां बिखेर देती हूं
आपके संग संग
अपने अधरों पर भी
एक मुस्कान सहेज लेती हूं....

स्वरचित

©नीलम गुप्ता 

Wednesday, February 10, 2021

किसी का दिल ना तोड़ों तुम ...सुजाता प्रिय 'समृद्धि'

निज टूटे हुए दिल ले, सभी मेरे पास आते हैं।
हम जोड़ेगे इसे ठीक से, लिए विश्वास आते हैं।

भरी है टोकरी दिल के, टुकड़े से यहां देखो,
इन्हीं टुकड़ों को ले मायुस, बड़ी उदास आते हैं।

जुटाकर दिल के टुकड़े को,सजाये हैं करीने से,
न कोई उल्टा-सीधा हो, यही एहसास आते हैं।

इसे रख सामने अपने, मरम्मत करने बैठे हैं,
मगर ये तो बड़े घायल,गुमे-हवास आते हैं।

लगाते हम हैं जब टांके,लहू इनसे टपकते हैं,
जो इनसे गिरते हैं लोहू, नहीं हमें रास आते हैं।

जोड़े ये नहीं जुटते ,भला कैसे इन्हें छोड़े,
खुदा भी हैं, तो क्या हैं हम,हो निराश जाते हैं।

अगर जुटते ये हमसेे,तो हम भी जोर कुछ करते ,
सभी जाते खुशी मन से,जो हो उदास आते हैं।

मनुज तुझसे है मिन्नत अब, किसी का दिल नहीं तोड़ो,
तुम अपने दिल में यह सोचो,ये मुद्दे खास आते हैं।

-सुजाता प्रिय 'समृद्धि' 

Tuesday, February 9, 2021

तुम मसीहा थे जानिब था हर फैसला तेरा ..पावनी जानिब

शर्म थी वो तुम तो शर्म कर ही सकते थे
दामन में उसके इज्जतें भर भी सकते थे।

माना के बेबसी में वो बदन बेचती रही
समझौता हालातों से तुम कर भी सकते थे।

लाज शर्म की उसने तुम्हें पतवार सौंप दी
रहमो करम की उसपे नजर कर भी सकते थे।

रिश्ता बनाके उसका तुम हाथ थाम लेते
कोठा कहते हो उसे घर कर भी सकते थे।

उसका गुनाह न अपना गिरेबां भी झांकिए
इंसान बनके तुम खुदा से डर भी सकते थे।

तुम मसीहा थे जानिब था हर फैसला तेरा
आंचल उढ़ाके तुम बदन को ढक भी सकते थे।

-पावनी जानिब सीतापुर 

Wednesday, January 27, 2021

याद के पहरों में जीते हैं ...अस्तित्व "अंकुर"

तुम्हारे साथ गुज़री याद के पहरों में जीते हैं,
हमें सब लोग कहते हैं कि हम टुकड़ों में जीते हैं,

हमें ताउम्र जीना है बिछड़ कर आपसे लेकिन,
बचे लम्हों की सौगातें चलो कतरों में जीते हैं,

वही कुछ ख्वाब जिनको बेवजह बेघर किया तुमने,
दिये उम्मीद के लेकर मेरी पलकों पे जीते हैं,

तुम्हारी बेरुखी पत्थर से बढ़कर काम आती है,
मेरे अरमान फिर भी काँच के महलों में जीते हैं,

जमाने की नज़र में हो चुके हैं खाक हम लेकिन,
हमें मालूम है हम आपकी नज़रों में जीते हैं,

मेरे हर शेर पर “अंकुर” यहाँ कुछ दिल धड़कते हैं,
यहाँ सब ज़िंदगी को हो न हो खतरों में जीते हैं,

-अस्तित्व "अंकुर"

 

Tuesday, January 26, 2021

काव्य ककहरा ....डॉ. अंशु सिंह


काव्य ककहरा जिससे सीखा
भूल गई उन हाथों को
स्वार्थ सिद्धि के खातिर अपनी
तोड़ दिया सब नातों को
कलम पकड़ना नहीं जानती
शब्द शब्द सिखलाये थे
हर पल हर क्षण साथ निभाकर
अक्षर ज्ञान कराये थे
जब-जब उसने काव्य रचा
वो पल पल साथ निभाये थे
शब्द शब्द को सदा सुधारे
अतुलित नेह दिखाये थे
मान दिया समकक्ष सुता के
गुरु सम ज्ञान सिखाये थे
स्वागत किया बहन सा घर में
सारा फ़र्ज़ निभाये थे
प्रथम बार जब मान वो पाई
गर्व सहित मुसुकाये थे
जिन गीतों में मान मिला था
वो भी वही सिखाये थे
फिर भी छोड़ चली चुपके से
दर्द से अति सकुचाये थे
काश वो हमसे कह कर जाती
हम ही समझ न पाये थे
बहुरूपिया के संग गई वो
कुछ भी न कर पाये थे
कह कर अपना सिक्का खोटा 
बहुत बहुत पछताये थे 

-डॉ. अंशु सिंह 

Monday, January 25, 2021

मैं अच्छी नहीं हूं ...पूजा गुप्ता


मैं अच्छी नहीं हूं
मुझे मेहँदी लगानी नहीं आती।
ना ही रंगोली बनानी आती।
मैं बंद बोतल के ढक्कन जैसी।
मुझे दही जमानी नहीं आती।
ना कभी व्रत की पति के लिए।
ना कभी बेटा के लिए।
मैं सब जैसी औरत नहीं।
मुझे गढ़ी कहानी नहीं आती।
मुझे ढोल बजाना नहीं आता।
ना नाचना गाना आता।
मैं अल्हड़ सी मस्तानी हूँ।
कोई हुनर जमाना नहीं आता।
लोगो के हँसी का पात्र हूँ।
मुझे अंदाज में रहना नहीं आता।
मैं बंद बोतल के ढक्कन जैसी।
मुझे दही जमाना नहीं आता।
सब कहते हैं भजन करो।
पर मुझे पुण्य कमाना नहीं आता।
मैं अल्हड़ सी मस्तानी हूँ।
कोई हुनर जमाना नहीं आता।
कुछ खूबी हो तो मैं लिखूँ।
मुझे अच्छा बन जाना नहीं आता।
घर की लक्ष्मी हूँ मैं।
पर मुझे नारायण को मनाना नहीं आता।
साधारण हूँ बेबाक भी हूँ मैं।
मुझे किसी को जलाना नहीं आता।
अंतर्मन की अंतर्वेदना हूँ मैं।
मुझे मजाक बनाना नहीं आता।
मैं बंद बोतल के ढक्कन जैसी।
मुझे दही जमाना नहीं आता।
मैं अल्हड़ सी मस्तानी हूँ।
कोई हुनर जमाना नहीं आता।
[स्वरचित]
-पूजा गुप्ता  

मिर्ज़ापुर (उत्तर प्रदेश)