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Friday, June 15, 2018

नश्तर मेरे सीने में गहराती चली गई.....महेश चन्द्र गुप्त 'ख़लिश'

उनकी जो आई याद तो आती चली गई
दिल में हज़ारों ख़्वाब वो लाती चली गई

मासूम आँखों में कोई तो राज़ था निहां
नग़मा कोई भूला सा दोहराती चली गई

जब भी मिलन उनसे हुआ तो आ गई ख़ुशी
उनकी जुदाई ग़म बहुत ढाती चली गई

जब -जब भी आई याद है रुख़्सत की वो घड़ी
नश्तर मेरे सीने में गहराती चली गई

रहते हैं मेरे साथ वो हर दम ख़लिश कि यूँ
रूह रास्ता सहरा में दिखलाती चली गई.

 बहर --- २२१२  २२१२  २२१२  १२

-महेश चन्द्र गुप्त 'ख़लिश'