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Saturday, December 13, 2014

आख़िर जो भी होना होगा..............'मीराजी'



हंसो तो साथ हंसेगी दुनिया बैठे अकेले रोना होगा
चुपके-चुपके बहा कर आंसू दिल के दुख को धोना होगा ।

बैरन रात बड़ी दुनिया की आंख से जो भी टपका मोती
पलकों से ही उठाना होगा पलकों ही से पिरोना होगा ।

खोने और पाने का जीवन नाम रखा है हर कोई जाने
उस का भेद कोई न देखा क्या पाना, क्या खोना होगा ।

बिन चाहे, बिन बोले पल में टूट-फूट कर फिर बन जाए
बालक सोच रहा है अब भी ऐसा कोई खिलौना होगा ।

प्यारों से मिल जाए प्यारे अनहोनी कब होगी
कांटे फूल बनेंगे कैसे,कब सुख सेज बिछौना होगा ।

बहते-बहते काम न आए लाख भंवर तूफानी-सागर
अब मंझधार में अपने हाथों जीवन नाव डुबोना होगा ।

जो भी दिल ने भूल से चाहा भूल में जाना हो के रहेगा
सोच-सोच कर हुआ न कुछ भी आओ अब तो खोना होगा ।

क्यूं जीते-जी हिम्मत हारें क्यूं फ़रियादें क्यूं ये पुकारे
होते-होते हो जाएगा आख़िर जो भी होना होगा

'मीरा' जी क्यूं सोच सताए पलक-पलक डोरी लहराए
किस्मत जो भी रंग दिखाए अपने दिल में समाना होगा

-मोहम्मद सनाउल्लाह सानी 'मीराजी' 

चित्र प्राप्तः गूगल इमेज


मीराजी (२५ मई १९१२ - ४ नवम्बर १९४९ ) का असली नाम मोहम्मद सनाउल्लाह सानी था। फितरत से आवारा और हद दर्जे के बोहेमियन मीराजी ने यह उपनाम अपने एक असफल प्रेम की नायिका मीरा सेन के गम से प्रेरित हो कर रखा
 

Saturday, October 4, 2014

ताने..............पवन करण





 






जिसे मैंनें अधूरा रख दिया पढ़कर
मैं उस किताब के पन्ने पलटता हूँ
मुझे उसमें तुम्हारा दिया एक ताना रखा मिलता है
मेरी सभी किताबों का यही हाल है
तुम्हारे दिये तानों से भरी है वे.

मैंनें जिसे पहना नहीं कई दिनों से
उस शर्ट को अलमारी से निकालता हूँ
देखता हूँ कि उसकी जेब में तुम्हारा दिया
एक ताना मुस्करा रहा है
पहनने के जितने कपड़े मेरे पास
उनकी एक भी जेब ऐसी नहीं
जिसमें तुम्हारा दिया ताना मौजूद न हो.

तुझसे बहुत दूर जाकर भी देख लिया
तुम्हारे तानों में कभी एक भी नही हुआ कम
जहां रुका मैं तुमसे दूर उस कमरे
या फिर यात्रा में बस या सीट पर ट्रेन की
एक भी नहीं छूटा कभी.

तुमसे प्रेम करना आसान नहीं रहा
तुम्हारे साथ-साथ तुम्हारे तानों से भी
करना पड़ा मुझे बराबर प्रेम.

-पवन करण

pawankaran64@gmail.com

जन्म : 18 जून, 1964, ग्वालियर मध्यप्रदेश

......रसरंग से

Monday, September 22, 2014

ये इक चराग कई आंधियों पे भारी है...........जाहिद हसन वसीम (वसीम बरेलवी)

 ये है तो सब के लिये हो ये ज़िद है हमारी
इस एक बात पे दुनिया से जंग ज़ारी है

उड़ान वालों उड़ानों पे वक्त भारी है
परों की अब नहीं हौसलों की बारी है

मैं कतरा होके भी तूफ़ां से जंग लेता हूं
मुझे बचाना समुंदर की जिम्मेदारी है

इसा बीच ज़लते हैं सहरा-ए-आरजू में च़राग
ये तिश्नगी तो मुझे जिंदगी से प्यारी है

कोई बताए ये उस के ग़ुरूर-ए-बेजा को
वो जंग लड़ी ही नहीं जो हारी है

हर एक सांस पे पहरा है बे-य़कीनी का
ये ज़िंदगी तो नहीं मौत की सवारी है

दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत
ये इक चराग कई आंधियों पे भारी है

-जाहिद हसन वसीम (वसीम बरेलवी)
............
सहरा-ए-आरजू : इच्छाओं का मरुस्थल, 
तिश्नगी : ख़्वाहिश, गुरूर-ए-बेजा : घमंड

जाहिद हसन वसीम (वसीन बरेलवी)
जन्म : 18 फरवरी, 1940, बरेली, रुहेलखण्ड,उत्तरप्रदेश.

Wednesday, September 10, 2014

फिर सब कुछ बहा ले जाएगी............आशुफ़्ता चंगेज़ी

 


बादबां खोलेगी और बंद-ए-क़बां ले जाएगी
रात फिर आएगी फिर सब कुछ बहा ले जाएगी

ख़्वाब जितने देखने हैं आज सारे दिन देख ले
क्या भरोसा कल कहां पागल हवा ले जाएगी

ये अंधेरे ग़नीमत कोई रस्ता ढूंढ़ लो
सुबह की पहली किरण आंखे उठा ले जाएगी

होश-मंदों से भरे हैं शहर और जंगल सभी
साथ किस-किस को भला काली घटा ले जाएगी

जागते मंजर, छतें, दालान, आंगन, खिड़कियां
अब के फेरे में हवा ये भी उड़ा ले जाएगी

एक इक करके सभी साथी पुराने पुराने खो गए
जो बचा है वो निगाह-ए-सुर्मा-सा ले जाएगी

जाते जाते देख लेना गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार
ज़िंदगी ली बांकपन लुत्फ़-ए ख़ता ले जाएगी

-आशुफ़्ता चंगेज़ी
जन्मः 1956 अलीगढ़, उत्तर प्रदेश
(1996 से गुमश़ुदा)
.................................................
बंद-ए-क़बां : कपड़े पर बंधी गाँठ,
निगाह-ए-सुर्मा-सा : काजल लगी आंखें,
गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार : दिन और रात,
बांकपन : आकर्षण, लुत्फ़-ए ख़ता : विलासिता
............रसरंग से

Monday, September 1, 2014

एक खत.............अमृता प्रीतम


चांद सूरज दो दवातें, कलम ने बोसा लिया
लिखितम तमाम धरती, पढ़तम तमाम लोग
 
साईंसदान दोस्तों !
गोलियां, बंदूकें और एटम बनाने से पहले
इस ख़त को पढ़ लेना

हुक्मरान दोस्तों !
सितारों की हरफ़ और किरणों की बोली
अगर पढ़नी नहीं आती
किसी अदीब से से पढ़वा लेना
अपने किसी महबूब से पढ़वा लेना
और हर एक मां की यह मातृ-बोली है
तुम बैठ जाना किसी ठाँव
और ख़त पढ़वा लेना अपनी मां से
फिर आना और मिलना
कि मुल्क की हद है जहां है
एक हद मुल्क का
और नाप कर देखो
एक हद इल्म का
एक हद इश्क की
और फि बताना कि किसकी हद कहां है

चांद सूरज दो दवातें
हाथ में कलम लो
इस ख़त का जवाब दो
-तुम्हारी-अपनी-धरती

तुम्हारे ख़त की राह देखते बहुत फिकर कर रही

-अमृता प्रीतम
जन्मः 31 अगस्त , 1919
गुजरावाला , पंजाब
निधनः 31 अक्टूबर 2005, दिल्ली


स्रोतः रसरंग
 



Sunday, August 24, 2014

मुझ को खुदा ने क्या दिया.......हफ़ीज जालंधरी(अदु-अल-असर)

 


  कोई दवा न दे सके मशवरा-ए-दुआ दिया
चारागरों ने और भी दिल का दर्द बढ़ा दिया

दोनों को दे सूरतें साथ ही आईना दिया
इश्क़ बिसोरने लगा हुस्न ने मुस्कुरा दिया

जौक-ए-निगाह के सिवा, शौक-ए-गुनाह के सिवा
मुझको बुतों से क्या मिला मुझ को खुदा ने क्या दिया

थी न ख़िजा की रोक-थाम दामन-ए-इख़्तियार में
हमने भरी बहार में अपना चमन लुटा दिया

हुस्न-ए-नज़र की आबरू सनअत-ए-बरहमन से है
जिस को सनम बना लिया उसको ख़ुदा बना दिया

दाग़ है मुझ पे इश्क़ का मेरा गुनाह भी तो देख
उस की निगाह भी तो देख जिस ने ये गुल खिला दिया

इश्क़ की मम्लिकत में है शोरिश-ए-अक्ल-ए-ना-मुराद
उभरा कहीं जो ये फ़साद दिल ने वहीं दबा दिया

नक़्श-ए-वफ़ा तो मैं ही था अब मुझे ढूंढते हो क्या
हर्फ़-ए-ग़लत नज़र पड़ा तुम ने मुझे मिटा दिया

ख़ुब्स-ए-दरूं दिखा दिया हर दहन-ए-ग़लीज मे
कुछ न कहा हफ़ीज़ ने हंस दिया मुस्कुरा दिया

-हफ़ीज जालंधरी (अदु-अल-असर)
जन्मः 14 जनवरी 1900, जालंधर, पंजाब ब्रिटिश भारत
मृत्युः 21 दिसम्बर 1982, लाहोर, पाकिस्तान



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इश्क़ बिसोरनेः रोना, जौक-ए-निगाहः दर्शन में रुचि,
शौक-ए-गुनाहः गुनाह करने की चाह, ख़िजाः बुढ़ापा,
सनअत-ए-बरहमनः पूजा करना, मम्लिकतः राज्य,
शोरिश-ए-अक्ल-ए-ना-मुरादः बुद्धि का दुर्भाग्यपूर्ण तूफान
,
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प्राप्ति स्रोतः रसरंग

Tuesday, August 19, 2014

अज़ीज़ इतना ही रखो कि जी संभल जाए...........उबैदुल्लाह अलीम



 अजीज़ इतना ही रखो कि जी संभल जाये
अब इस क़दर भी ना चाहो कि दम निकल जाये

मोहब्बतों में अजब है दिलों का धड़का सा
कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाये

मिले हैं यूं तो बोहत, आओ अब मिलें यूं भी
कि रूह गरमी-ए-इन्फास* से पिघल जाये

मैं वोह चिराग़ सर-ए-राह्गुज़ार-ए-दुनिया
जो अपनी ज़ात की तनहाइयों में जल जाये

ज़िहे! वोह दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे
खुशा! वोह उम्र जो ख़्वाबों में ही बहल जाये

हर एक लहज़ा यही आरजू यही हसरत
जो आग दिल में है वोह शेर में भी ढल जाये

गरमी-ए-इन्फासः सांसे
खुशाः खुशी

-उबैदुल्लाह अलीम
1939-1997

Wednesday, August 13, 2014

मेरा वतन वही है.............मोहम्मद अल्लामा इकबाल




  
चिश्ती ने जिस ज़मीं पे पैग़ामे-ए-ह़क सुनाया
नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया

तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया
जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया

मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था

सारे जहां को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

तुर्कों का जिस नें दामन हीरों से भर दिया था
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमां से
फिर ताब दे के जिसने चमकाए कहकशां से

वहदत की लय सुनी थी दुनियां ने जिस मकां से
मीर-ए-अरब को आई ठण्डी हवा जहां से

मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
बंदे कलीम जिस के पर्बत का सीना

नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहां सफ़ीना
रिफ़अत है जिस ज़मी की बाम-ए फलक का ज़ीना

जन्नत की ज़िंदगी जिस की फ़ज़ा में जीना
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

-मोहम्मद अल्लामा इकबाल
जन्म: 09 नवम्बर 1877
निधन: 21 अप्रैल 1938


पैग़ामे-ए-ह़कः सच का संदेश , वहदतः एकता ,
फ़ारसः ईरान , सफ़ीनाः नाव , रिफ़अतः ऊँचाई ,
बाम-ए फलकः आसमान की छत ,
स्रोतः रसरंग

Monday, July 14, 2014

काश कि ऐसा होता..........अनन्त माहेश्वरी


 
अनगढ़ पत्थरों में अक्श तलाशता
उन्हें सुघड़ बनाने की कोशिश करता
इस कोशिश में चोटिल होता

लेकिन हिम्मत नहीं हारता
वह बेजान पत्थरों में जान डालता

शिल्पी का शिल्प जब साकार हुआ
बेजान थी वह मूरत,जिससे उसे प्यार हुआ

एक दिन कला का पारखी आया
ले गया उस मूरत को,
जिसे शिल्पी ने दिलो जान से सजाया.

काश कि ऐसा होता
शिल्पकार का दिल पत्थर का होता
तो अपनी प्यारी मूरत के जाने पर
वह नहीं रोता, वह नहीं रोता

-अनन्त माहेश्वरी, खण्डवा, मध्य प्रदेश
स्रोतः रसरंग

Sunday, June 15, 2014

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा.....डॉ. विष्णु सक्सेना

 
 
रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा,
एक आई लहर तो कुछ बचेगा नहीं
तुमने पत्थर सा दिल कह तो दिया हमको
पत्थरों पर लिखोगे तो मिटेगा नहीं

मैं तो पतझर था फिर क्यूं निमंत्रण दिया
ऋतु बसंती को तन में लपेटे हुए
आस मन में लिए प्यास तन में लिए
कब शरद आई पल्लू समेटे हुए

तुमने फेरी निगाहें अंधेरा हुआ
ऐसा लगता है सूरज उगेगा नहीं
मैं तो होली मना लूंगा सच मानिए
तुम दिवाली बनोगी ये आभास दो

मैं तुम्हें सौंप दूंगा तुम्हरी धरा
तुम मेरे पंखों को आकाश दो
उंगलियो पर दुपट्टा लपेटो न तुम
यूं करोगे तो दिल चुप रहेगा नहीं

आंख खोली तो तुम रुक्मिनी-सी लगी
बंद की तो राधिका लगी तुम
जब भी कभी तुम्हें शांत एकांत में
मीरा बाई-सी साधिका तुम लगी

कृष्ण की बाँसुरी पर भरोसा रखो
मन कहीं भी रहे डिगेगा नहीं...

-डॉ. विष्णु सक्सेना
 
प्राप्ति स्रोतः रसरंग

Wednesday, June 4, 2014

फिर कर लेने दो प्यार प्रिये...........दुष्यन्त कुमार


अब अंतर में अवसाद नहीं
चापल्य नहीं उन्माद नहीं
सूना-सूना सा जीवन है
कुछ शोक नहीं आल्हाद नहीं
 

तव स्वागत में हिलता रहता
अंतर वीणा का तार प्रिये
 

इच्छाएं मुझको लूट चुकी
आशाएं मुझसे छूट चुकी
सुख की सुन्दर-सुन्दर लड़ियां
मेरे हाथों से टूट चुकी
 

खो बैठा अपने हाथों ही
मैं अपना कोष अपार प्रिये
फिर कर लेने दो प्यार प्रिये
 
- दुष्यन्त कुमार
स्रोतः रसरंग