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Friday, September 15, 2017

मिट्टी से मशविरा न कर...अभिषेक शुक्ला


मिट्टी से मशविरा न कर, पानी का भी कहा न मान
ऐ आतिश-ए-दुरुं मेरी, पाबंदी-ए-हवा न मान

हर एक लुग़त से मावरा मैं  हूँ अजब मुहावरा
मेरी ज़बान में पढ़ मुझे, दुनिया का तर्जुमा न मान

होने में या न होने में मेरा भी कोई दखल है?
मैं हूँ ये उसका हुक्म है, इसको मेरी रज़ा न मान

टूटे हैं मुझ पे क़हर भी, मैंने पिया है ज़हर भी
मेरी ज़ुबाने तल्ख़ का इतना भी बुरा न मान

बस एक दीद भर का है, फिर तो ये वक़्फ़ए-हयात
उनके क़रीब जा मगर आँखों की इल्तिजा न मान

हर शाख ज़र्द ज़र्द है, हर फूल दर्द दर्द है
मुझ में ख़िज़ाँ मुक़ीम है, मुझको हरा भरा न मान

ज़ेब-ए-तन और कुछ नहीं, जुज़ तेरी आरज़ू के अब
तू भी मुहाल है तो फिर मुझ पर कोई क़बा न मान 
-अभिषेक शुक्ला