मिट्टी से मशविरा न कर, पानी का भी कहा न मान
ऐ आतिश-ए-दुरुं मेरी, पाबंदी-ए-हवा न मान
हर एक लुग़त से मावरा मैं हूँ अजब मुहावरा
मेरी ज़बान में पढ़ मुझे, दुनिया का तर्जुमा न मान
होने में या न होने में मेरा भी कोई दखल है?
मैं हूँ ये उसका हुक्म है, इसको मेरी रज़ा न मान
टूटे हैं मुझ पे क़हर भी, मैंने पिया है ज़हर भी
मेरी ज़ुबाने तल्ख़ का इतना भी बुरा न मान
बस एक दीद भर का है, फिर तो ये वक़्फ़ए-हयात
उनके क़रीब जा मगर आँखों की इल्तिजा न मान
हर शाख ज़र्द ज़र्द है, हर फूल दर्द दर्द है
मुझ में ख़िज़ाँ मुक़ीम है, मुझको हरा भरा न मान
ज़ेब-ए-तन और कुछ नहीं, जुज़ तेरी आरज़ू के अब
तू भी मुहाल है तो फिर मुझ पर कोई क़बा न मान
-अभिषेक शुक्ला

