उठ जाता हूं भोर से पहले सपने सुहाने नही आते ,
अब मुझे स्कूल न जाने वाले बहाने बनाने नही आते ,
कभी पा लेते थे घर से निकलते ही मंजिल को ,
अब मीलों सफर करके भी ठिकाने नही आते ,
मुंह चिढाती है खाली जेब महीने के आखिर में ,
अब बचपन की तरह गुल्लक में पैसे बचाने नही आते ,
यूं तो रखते हैं बहुत से लोग पलको पर मुझे ,
मगर बेमतलब बचपन की तरह गोदी उठाने नही आते ,
माना कि जिम्मेदारियों की बेड़ियों में जकड़ा हूं ,
क्यूं बचपन की तरह छुड़वाने वो दोस्त पुराने नही आते ,
बहला रहा हूं बस दिल को बच्चों की तरह ,
मैं जानता हूं फिर वापस बीते हुए जमाने नही आते.....!!
-मनोज पुरोहित
ब्रांच मैनेजर
एस बी आई लाइफ
नाहन
