ज़िन्दगी की राह में वो मुक़ाम आये हैं।
हमने चोट खाई है फिर भी गीत गाये हैं।।
लाख हादिसे हमें रोकें आ के राह में,
रोके रुक न पाएंगे जब क़दम बढ़ाये हैं।
जगमगाता आवरण देखा तो पता चला,
पन्ने उस क़िताब के ख़ून में नहाये हैं।
आई जो बुरी घड़ी वक़्त ने ये सीख दी,
मतलबी जहान में अपने भी पराये हैं।
धूप में खड़ा हुआ आज है वही ‘अरुण’
जिसने औरों के लिए पेड़ ख़ुद लगाये हैं।
- अरुण तिवारी "अनजान"

