Wednesday, July 15, 2020

राख को भी कुरेद कर देखो ...गुलज़ार

आइना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

आंखों से आंसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमां ये घर में आएं तो चुभता नहीं धुआं

चूल्हे नहीं जलाए कि बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआं


ये दिल भी दोस्त ज़मीं की तरह
हो जाता है डांवा-डोल कभी

ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा
वगर्ना ज़िंदगी भर को रुला दिया होता


ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी थी
उन की बात सुनी भी हम ने अपनी बात सुनाई भी

राख को भी कुरेद कर देखो
अभी जलता हो कोई पल शायद


दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसां उतारता है कोई

कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
आज की दास्तां हमारी है


कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है
-गुलज़ार

4 comments:

  1. एक एक शब्द लाजबाव है
    बेहद सुंदर रचना

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा - 3764 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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  3. इतने गहरे विचार बहुत खूब
    मैंने हाल ही में ब्लॉगर ज्वाइन किया है आपसे निवेदन करना चाहती हूं कि आप मेरे पोस्ट को पढ़े और मुझे सही दिशा निर्दश दे
    https://shrikrishna444.blogspot.com/?m=1

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