Thursday, June 6, 2019

स्त्री की दास्तां...डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

मैं पानी हूँ..
तरल,स्वच्छ और नरम
ओ समय! तुम यदि पत्थर भी हो
तो कोई बात नहीं
चलती रहूँगी प्यार से
तुम्हारी कठोर सतह पर
धार बनकर
एक दिन तुम्हारी कठोर सतह
पर केवल मेरे निशान होंगे
और होगी कभी न थकने वाली
स्त्री की दास्तां...
डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

7 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (07-06-2019) को "हमारा परिवेश" (चर्चा अंक- 3359) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. नरम सतह पर स्थायी निशान नहीं पडते, कठोर सतह पर पड जाता है

    बहुत सुंदर भाव की रचना

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  3. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति :)

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