Wednesday, June 26, 2019

कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी.....दिगंबर नासवा

पत्थर मिलेंगे टूटे, तन्हाइयां मिलेंगी
मासूम खंडहरों में, परछाइयां मिलेंगी

इंसान की गली से, इंसानियत नदारद
मासूम अधखिली से, अमराइयां मिलेंगी

कुछ चूड़ियों की किरचें, कुछ आंसुओं के धब्बे
जालों से कुछ लटकती, रुस्वाइयां मिलेंगी

बाज़ार में हैं मिलते, ताली बजाने वाले
पैसे नहीं जो फैंके, जम्हाइयां मिलेंगी

पहले कहा था अपना, ईमान मत जगाना
इंसानियत के बदले, कठिनाइयां मिलेंगी

बातों के वो धनी हैं, बातों में उनकी तुमको
आकाश से भी ऊंची, ऊंचाइयां मिलेंगी

हर घर के आईने में, बस झूठ ही मिलेगा
कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी !!


लेखक परिचय -  दिगंबर नासवा

12 comments:

  1. आभार भाई संजय जी
    सादर...

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  2. वाह कचरे के डिब्बे में सच्चाइयां मिलेंगी
    मार्मिक प्रस्तुति

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  3. वाह!!दिगंबर जी ,बहुत ही भावपूर्ण रचना । हमारे समाज की कडवी सच्चाई को उजागर करती हुई ।

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  4. वाह...
    क्या कहने नासवा जी का
    लाजवाब

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  5. वाह बहुत सुंदर रचना ।

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  6. वाह !बहुत ख़ूब 👌👌

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  7. पूरी ही गज़ल लाज़बाब .क्या कहूँ .हर शे र दिल में उतरता है . मासूम अधखिली से ..में शायद सी है . मासूम अधखिली सी अमराइयाँ ..नासवा जी क्या मैं सही हूँ ?

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  8. हर घर के आईने में, बस झूठ ही मिलेगा
    कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी
    हकीकत.. ,बहुत ही शानदार ,सादर नमन

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  9. वाह शब्द शब्द दिल में उतर रहे मान्यवर लाज़बाब रचना

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  10. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 27.6.19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3379 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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