Tuesday, June 11, 2019

मानो रात से रोशनी टूटी हो ...निधि सक्सेना

स्त्री सुख की खोज में
और प्रेम की चाह में
मरीचिका की मृगी की तरह भागती रहती है 
पिता के घर से पति के घर
पति के घर से बेटे के घर ..
पुनः पुनः लौटने को ..

हर जगह से बटोरती हैं क़िस्से 
जिन्हें याद कर अतीत में झाँकती रहती है..

न जाने क्यों 
हर वर्तमान अतीत से ज़्यादा बेबस मालूम होता है 
अतीत से ज़्यादा ख़ाली ..

न जाने क्यों 
हर बार प्रेम और सुख की चाह यूँ टूटती है
मानो रात से रोशनी टूटी हो ...
-निधि सक्सेना

14 comments:

  1. मर्मस्पर्शीय ....

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  2. जमाना बदल गया भारत विकास की राह पर चल पड़ा परन्तु कुछ अपवादों के सिवाय नारी की वही कहानी है जो सदियों से चली आरही है
    "आँचल में है दूध और आंखों में पानी" मर्मस्पर्शीय रचना

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  3. हृदयस्पर्शी सृजन ।

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  4. हृदय स्पर्शी रचना ।
    अनुभूतियां और अहसास।

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  5. एक औरत के मनोभाव का बहुत ही सुंदर चित्रण ,सादर नमस्कार

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  6. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (12-06-2019) को "इंसानियत का रंग " (चर्चा अंक- 3364) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  7. बहुत सुंदर प्रस्तुति।

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  8. इतना बढ़िया लेख पोस्ट करने के लिए धन्यवाद! अच्छा काम करते रहें!। इस अद्भुत लेख के लिए धन्यवाद
    gana download kaise kare

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  9. वाह!!बहुत खूब!

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  10. न जाने क्यों
    हर वर्तमान अतीत से ज़्यादा बेबस मालूम होता है
    अतीत से ज़्यादा ख़ाली। बहुत सुन्दर। स्वयं शून्य

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  11. बहुत ही सुंदर चित्रण

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