Friday, June 21, 2019

ज़माने का चलन .....डॉ. ऋचा सत्यार्थी

हर दिशा में लम्हा-लम्हा बो गया है
कह के हमसे अलविदा वह जो गया है

कर लिए सूरज से समझौते घटा ने
उजली सुबह का वादा सो गया है

इस शहर में ख़ुशनुमा है आज मौसम
यह समां रंगीन, लेकिन, खो गया है

था किनारे का हंसी मंज़र छलावा
गम के सागर में डुबो हमको गया है

दुश्मनों से प्यार, नफ़रत दोस्तों से
यह ज़माने का चलन हो गया है

-डॉ. ऋचा सत्यार्थी

4 comments:

  1. कर लिए सूरज से समझौते घटा ने
    उजली सुबह का वादा सो गया है
    वाहः सुंदर ग़ज़ल

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  2. वाह ! बेहतरीन
    सादर

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