वो ग़ुम रहे अपने ही ख़्यालों की धूल में
करते रहे तलाश जिन्हें फूल-फूल में
गीली हवा की लम्स ने सिहरा दिया बदन
यादों ने उनकी छू लिया फिर आज भूल में
उसने तो बात की थी यूँ ही खेल-खेल में
पर लुट गया ये दिल मेरा शौक़े-फ़ज़ूल में
होने लगा गलियों का जिक्र आसमां में
फिर उम्रभर अटे रहे लफ्ज़ों की धूल में
एहसान आपका जो वक़्त आपने दिया
चुभी किर्चियां फूलों की निगाहे-मलूल में
-श्वेता सिन्हा
निगाहे-मलूल = उदास आँखों में
बहुत ख़ूब श्वेता !
ReplyDeleteपन्त जी की शिष्या, मिर्ज़ा ग़ालिब के अंदाज़ में !
वाह बेहद शानदार
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