Friday, August 2, 2019

मन, शहरी नही हुआ.....संध्या शर्मा


रोटी, मन, गाँव, शहर
सब्जी तरकारी में
फूलों की क्यारी में
रोटी के स्वाद में 
पापड़ अचार में 
मेवों पकवानों में
ऊँचे मकानों में 
बूढे से बरगद में
शहरों की सरहद में 
तीज त्योहार में 
मान मनुहार में
लोक व्यवहार में 
नवीन परिधान में 
बेगानो की भीड़ में 
संकरी गलियों में 
मौन परछाइयों में 
कांक्रीट की ज़मीन में 
धुँआ-धुँआ आसमां में 
अब भी गाँव ढूँढता है 
मन, शहरी नही हुआ ....


लेखिका परिचय - संध्या शर्मा 

8 comments:

  1. बेहतरीन रचना
    आभार
    सादर...

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  2. निसंदेह सत्य बेहतरीन उपलब्धि

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" शुक्रवार 02 अगस्त 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (02-08-2019) को "हरेला का त्यौहार" (चर्चा अंक- 3416) पर भी होगी।


    --

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है

    ….

    अनीता सैनी

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  5. वाह सन्ध्या . यहाँ गुजरते हुए तुम मिल गईं अचानक . मन सचमुच सहरी नहीं हुआ क्योंकि उसकी जड़ें अभी तक गाँव की माटी में जमी हैं . बहुत सुन्दर लयबद्ध कविता .

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  6. वाह बहुत सुंदर और मन को स्पर्श करता सच्चा कथन मन शहरी ना हुआ।

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