Tuesday, August 20, 2019

इबादत मेरी ...मुदिता

नवाजिश करम और इनायत तेरी
तुमको जीना हुआ इबादत मेरी ...

हँसी होठों पे दिल में दर्द लिए
क़ाबिले दाद है लियाकत मेरी ...

रोकना कश्ती को ना है बस में उसके
मौजे सागर से अब है बगावत मेरी ...

लाख आगाह किया वाइज़ ने मुझको
डूबना इश्क में ठहरी थी रवायत मेरी....

हर इक इल्ज़ाम पे सर झुकता है
देगी गवाही खुद ही सदाक़त मेरी...

नाम शामिल था वफादारों में मेरा
आँखों में छलक आयी अदावत मेरी...
-मुदिता

मायने:
इनायत-मेहरबानी/कृपा, इबादत-पूजा, 
लियाकत-योग्यता, बग़ावत-विद्रोह,
वाइज़ - उपदेशक, रवायत-परंपरा,
सदाक़त-सच्चाई, अदावत-दुश्मनी


9 comments:

  1. बेहद सुंदर प्रस्तुति

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (21-08-2019) को "जानवर जैसा बनाती है सुरा" (चर्चा अंक- 3434) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. उम्दा/बेहतरीन सृजन।

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  4. उत्कृष्ट भाव सृजन

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  5. वाह !बहुत ही सुन्दर सृजन

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  6. बहुत लाजवाब....
    वाह!!!

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  7. हँसी होठों पे दिल में दर्द लिए
    क़ाबिले दाद है लियाकत मेरी ...

    laajwaab gazal hui...achhe ehsaas jodhe hain aapne...

    bdhaayi

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