Friday, September 13, 2019

भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है....कविता रावत


पहनने वाला ही जानता है जूता कहाँ काटता है
जिसे कांटा चुभे वही उसकी चुभन समझता है !



पराये दिल का दर्द अक्सर काठ का लगता है

पर अपने दिल का दर्द पहाड़ सा लगता है !



अंगारों को झेलना चिलम खूब जानती है

समझ तब आती है जब सर पर पड़ती है !



पराई दावत पर सबकी भूख बढ़ जाती है

अक्सर पड़ोसी मुर्गी ज्यादा अण्डे देती है !



अपने कन्धों का बोझ सबको भारी लगता है

सीधा  आदमी  पराए  बोझ  से दबा रहता है !



पराई चिन्ता में अपनी नींद कौन उड़ाता है

भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है !



लेखिका - कविता रावत 

7 comments:

  1. पहनने वाला ही जानता है जूता कहाँ काटता है
    जिसे कांटा चुभे वही उसकी चुभन समझता है !
    बहुत सुंदर।

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (14-09-2019) को " हिन्दीदिवस " (चर्चा अंक- 3458) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

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  3. प्रस्तुति हेतु धन्यवाद और आभार आपका

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  4. बहुत ही सुन्दर रचना

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