Sunday, September 1, 2019

तबीयत हमारी है भारी ....वीरेन्द्र खरे ’अकेला’

तबीयत हमारी है भारी सुबह से 
कि याद आ गई है तुम्हारी सुबह से 

न थी घर में चीनी तो कल ही बताती 
करेगा न बनिया उधारी सुबह से 

बता दे कि हम ख़ुद ही सोए थे भूखे 
खड़ा अपने द्वारे भिखारी सुबह से 

न उसकी हमारी अदावत पे जाओ 
हुआ रात झगड़ा, तो यारी सुबह से 

हुआ अपशगुन ये कि इक नेता जी पे 
नज़र पड़ गई है हमारी सुबह से 

परिन्दों की दहशत है वाजिब 'अकेला'
खड़े हर तरफ़ हैं शिकारी सुबह से
-वीरेन्द्र खरे 'अकेला'

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-09-2019) को "अपना पुण्य-प्रदेश" (चर्चा अंक- 3446) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बेहतरीन रचना

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  3. बेहतरीन/उम्दा सृजन ।

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