Wednesday, April 8, 2020

देखा है किस निगाह से ...नवीन मणि त्रिपाठी

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सब लोग मुन्तज़िर है वहाँ माहताब के ।
चेहरे पढ़े गए हैं जहाँ इज़्तिराब के ।।

छुपता कहाँ है इश्क़ छुपाने के बाद भी ।
होने लगे हैं शह्र में चर्चे ज़नाब के ।।

दौलत के नाम पर वही भटके हुए मिले ।
किस्से सुना रहे थे जो मुझको सराब के ।।

बदला ज़माना है या मुकद्दर खराब है ।
मिलते नहीं हैं यार भी अपने हिसाब के ।।

साज़िश रची गयी है वहीं देश के ख़िलाफ़ ।
नारे जहाँ लगे थे कभी इंकलाब के ।।

साकी उसे पिलाने की ज़िद कर न बारहा ।
जो जी रहा है मुद्दतों से बिन शराब के ।।

नाज़ ओ नाफ़ासतों से वो मगरूर क्यूँ न हों ।
जब दाम लग रहे हैं सनम के हिज़ाब के ।।

है उनकी खुश्बुओं से मुअत्तर चमन मेरा ।
भेजे थे तुमने फूल जो मुझको ग़ुलाब के ।।

दरिया ए आग इश्क़ है छूना सँभल के तुम ।
जलते दिखे हैं हाथ यहाँ आफ़ताब के ।।

देखा है किस निगाह से हमने तुझे ऐ चाँद ।
जा पढ़ तू मेरे शेर अदब की क़िताब के ।।

-नवीन मणि त्रिपाठी

13 comments:

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    1. तहेदिल से बहुत शुक्रिया

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    1. तहेदिल से बहुत शुक्रिया

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुघवार 08 एप्रिल 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. तहेदिल से बहुत शुक्रिया

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  5. सुन्दर प्रस्तुति

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    1. आ0 तहेदिल से बहुत शुक्रिया

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    1. आ0 तहेदिल से बहुत शुक्रिया

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    1. आ0 तहेदिल से बहुत शुक्रिया

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  8. आ0 तहेदिल से बहुत शुक्रिया

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