Tuesday, June 2, 2020

संस्कारों में व्यथा उलझ गई .....निधि सक्सेना

तनिक ठहरो
रुको तो
देखो साड़ी में पायल उलझ गई
कि दायित्व में अलंकार उलझ गए
संस्कारों में व्यथा उलझ गई..
कल भी ऐसा ही हुआ था
कल भी पुकारा था तुम्हें
कल भी तुम न रुके..
सुनो ये वही पायल हैं
जो मैंने भांवरों में पहनी थी
ये साक्षी हैं तुम्हारे उस वचन की
कि तुम मुझे अनुगामिनी नहीं
सखा स्वीकारोगे..
तुम मेरे स्वामी नहीं
मित्र बनोगे..
अब यहां आओ
और इसे सुलझाओ
सुलझाओ कि मैं  
तुम्हारे दायित्वों को 
अलंकार की भांति घारण करूँ..
सुलझाओ की 
संस्कारों के वहन में 
हम सहभागी हैं
सुलझाओ कि इस यात्रा की 
परिणति ही प्रेम  है..
-निधि सक्सेना

11 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  2. वाह अति सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  3. बहुत खूबसूरत रचना

    ReplyDelete
  4. बहुत प्यारी रचना

    ReplyDelete
  5. कभी-कभी किसी न किसी एक को सहभागी होना याद नहीं रह जाता है

    सुंदर रचना

    ReplyDelete
  6. वाह अद्भुत सृजन👏👏👏👏👏

    ReplyDelete
  7. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  8. स्वयं को ही सखा या
    मित्र होने के लिए
    प्रतीकात्मक
    सिन्दूर की प्रासंगिकता
    और सहभागी
    होने के लिए
    तीज और
    वट सावित्री पूजन की
    एकतरफा सहभागिता,
    इन सब पर
    तनिक सोचना होगा,
    तनिक ठहरना होगा।

    तब शायद
    बुलाना ना पड़े,
    बन कर
    सुहाग-सखा की
    अनुगामिनी।
    श्रृंगार के नाम पर
    बेड़ियों-से
    होंगे पाँवों में
    पायल जब तक,
    साड़ी से कई बार
    उलझेंगे ही।

    ( क्षमा याचना सहित ... 🙏 )

    ReplyDelete