Wednesday, October 24, 2018

ना दिवाली होती न पठाखे छूटते....हरिवंश राय बच्चन


अमृतसर में रावण पुतला दहन के दौरान हुए 
रेल दुर्घटना में सैकड़ों लोगों के मारे जाने पर हरिवंशराय बच्चन की लिखी यह कविता 
आज के दौर में प्रासंगिक लगी। आप सभी के 
लिए पेश है :......
ना दिवाली होती और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,

....काश कोई धर्म ना होता....
....काश कोई मजहब ना होता....
ना अर्ध देते, ना स्नान होता

ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता
जब भी प्यास लगती, नदियों का पानी पीते

पेड़ों की छाव होती, नदियों का गर्जन होता
ना भगवानों की लीला होती, ना अवतारों का नाटक होता

ना देशों की सीमा होती , ना दिलों का फाटक होता
ना कोई झुठा काजी होता, ना लफंगा साधु होता

ईन्सानीयत के दरबार मे, सबका भला होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,

....काश कोई धर्म ना होता.....
....काश कोई मजहब ना होता....
कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता

कोई दलित ना होता, कोई काफ़िर ना होता
कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता

किसी के दर्द से कोई बेखबर ना होता
ना ही गीता होती, और ना कुरान होती,

ना ही अल्लाह होता, ना भगवान होता
तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता.

ना मैं हिन्दू होता, ना तू भी मुसलमान होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता।
हरिवंशराय बच्चन

6 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25.10.18 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3135 में दिया जाएगा

    हार्दिक धन्यवाद

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व पोलियो दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. इंसान होना, आज भी उतना ही संभव है, जितना सृष्टि के आदिकाल में था। धर्म हमें बेहतर मानव बनाता है। हिंसक पशु बनना, हर इंसान का अपना चुनाव है, और सदा से रहा है।

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  4. बात-बात पर बाबूजी की कविताओं का सार्वजानिक पाठ करने वाले अमिताभ कभी भी इसको नहीं सुना पाए !

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