Tuesday, December 17, 2019

वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो :(

ये अँधेरा भी छंटेगा धूप को आने तो दो
मुट्ठियों में आज खुशियाँ भर के घर लाने तो दो

खुद को हल्का कर सकोगे ज़िन्दगी के बोझ से
दर्द अपना आँसुओं के संग बह जाने तो दो

झूम के आता पवन देता निमंत्रण प्रेम का
छू सके जो मन-मयूरी गीत फिर गाने तो दो

बारिशों का रोक के कब तक रखोगे आगमन
खोल दो जुल्फें घटा सावन की अब छाने तो दो

सब की मेहनत के भरोसे आ गया इस मोड़ पर
नाम है साझा सभी के तुम शिखर पाने तो दो

पक चुकी है उम्र अब क्या दोस्ती क्या दुश्मनी
वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...

लेखक परिचय - दिगंबर नासवा


8 comments:

  1. "धूप को आने तो दो" वाह वाह, बहुत खूब

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 18 दिसम्बर 2019 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. हर शेर बेहतरीन,कुछ कहता सा सुंदर उम्दा भाव ।

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  4. यह कविता पढ़ते ही मन में उम्मीद की हल्की सी धूप फैल जाती है। तुम अँधेरे से लड़ते नहीं, उसे खुद हटने का वक्त देते हो, और यही बात मुझे बहुत सच्ची लगी। दर्द को बह जाने देने और खुशियों को घर लाने की बात सीधे दिल से निकलती लगती है।

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