Friday, December 13, 2019

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ :)

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा फुकनी जैसी माँ



बान की खुर्री खाट के ऊपर

हर आहट पर कान धरे
आधी सोयी आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ



चिडियों की चहकार में गूंजे

राधा-मोहन अली-अली
मुर्गे की आवाज से खुलती
घर की कुण्डी जैसी माँ



बीबी बेटी बहन पडोसन

थोडी थोडी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ



बाँट के अपना चेहरा माथा

आँखे जाने कहाँ गयीं
फटे पुराने एक एल्बम में
चंचल लड़की जैसी माँ 


4 comments:

  1. बहुत कमाल की ग़ज़ल है ये ... शायद निदा फाज़ली की ...
    बहुत लाजवाब ...

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  2. बहुत ही प्यारी रचना ,संजय जी

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  3. सच कहूँ तो आपकी ये कविता पढ़कर मेरी आँखें नम हो गईं। आपने माँ को जिस तरह रोजमर्रा की चीज़ों से जोड़ा है, वह सीधे दिल में उतरता है। “नटनी जैसी माँ” वाली पंक्ति ने मुझे सबसे ज्यादा छुआ, क्योंकि सच में माँ दिनभर संतुलन बनाती रहती है और कभी शिकायत नहीं करती।

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