Wednesday, December 23, 2020

बह चली नेह गंगा ....डॉ. अंशु सिंह


तुमको बाँहों के बन्धन में मैं बाँध लूँ
नेह से तेरे मस्तक पर मैं चूम लूँ

शुभ दिवस पर तुम्हें क्या मैं अर्पण करूँ
धड़कनों की मधुर तान पर झूम लूँ

अपनी झोली भरूँ तेरे आशीष से
भर दूँ तेरे हृदय को अमर प्यार से

मन तो आकुल बहुत है तेरी याद में
बाँध लू चाँद अंबर में मनुहार से

नव सृजन से मैं तेरी करूँ अर्चना
शब्द हैं मौन कह दूँ इशारों से मैं

तुम तो नयनों से उतरे हृदय में बसे
कल्पना को सजाती सितारों से मैं

चूम कर तेरे माथे की उलझी लटें
भर दिया प्यार से सांध्य आकाश है

बिखरी अलकों को सुलझा रही हूँ तेरी
भर गया आज तन मन में मधुमास है

बह चली नेह गंगा नयन कोर से
भीगते छोर आँचल किनारों से हैं

प्रीति भरके प्रवाहित हुई एक नदी
झूमती दस दिशाऐं बहारों से हैं

तब प्रणय गीत अधरों पे सजने लगे
बन्द पलकें सजल डबडबाने लगीं

लेखनी चल पड़ी तेरे अहसास कर
शब्द दर शब्द भर कंपकंपाने लगी

-डॉ. अंशु सिंह

11 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 23 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  3. बहुत खूबसूरत कृति

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  4. सुंदर अभिव्यक्ति

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  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24.12.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
    धन्यवाद

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  6. सुन्दर प्रस्तुति

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  7. बह चली नेह गंगा नयन कोर से
    भीगते छोर आँचल किनारों से हैं

    प्रीति भरके प्रवाहित हुई एक नदी
    झूमती दस दिशाऐं बहारों से हैं

    कोमल भावनाओं से ओतप्रोत बहुत श्रेष्ठ सुंदर रचना...

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