Friday, December 18, 2020

उठ समाधि से ध्यान की, उठ चल .... जौन एलिया




उठ समाधि से ध्यान की, उठ चल

उस गली से गुमान की, उठ चल


मांगते हो जहाँ लहू भी उधार

तुने वां क्यों दूकान की, उठ चल


बैठ मत एक आस्तान पे अभी

उम्र है यह उठान की, उठ चल


किसी बस्ती का हो न वाबस्ता

सैर कर इस जहाँ की, उठ चल


जिस्म में पाँव है अभी मौजूद 

जंग करना है जान की, उठ चल

 

तू है बेहाल और यहाँ साजिश  

है किसी इम्तेहान की, उठ चल 


है मदारो में अपने सय्यारे 

ये घड़ी है अमान की, उठ चल 


क्या है परदेस को देस कहाँ  

थी वह लुकनत जुबां की, उठ चल 


हर किनारा खुर्म मौज थे 

याद करती है बान की, उठ चल 


- जौन एलिया

मूल रचना



5 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 18 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. मुग्ध करती सुन्दर रचना।

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  3. जान एलिया से रूबरू होना खुद को एक अजीब अहसास में पाने जैसा है । रूबरू कराने हेतु आभार ।

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  4. उत्कृष्ट रचना।
    सादर।

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