Thursday, December 10, 2020

इस आत्महत्या के युग में, कैसे खिलते हैं फूल: दिनकर कुमार इरशाद



इस आत्महत्या के युग में
कैसे खिलते हैं फूल
मंडराते हैं भँवरे
गाती है कोयल

इस आत्महत्या के युग में
कैसे नदी जाकर
मिलती है सागर से
कैसे लहरें मचलती हैं
चाँद को छूना चाहती हैं

इस आत्महत्या के युग में
कैसे खिलते हैं फूल
मंडराते हैं भँवरे
गाती है कोयल

इस आत्महत्या के युग में
कैसे नदी जाकर
मिलती है सागर से
कैसे लहरें मचलती हैं
चाँद को छूना चाहती हैं
इस आत्महत्या के युग में
कैसे प्रेम किया जाता है
कैसे भावनाओं को
जिया जाता है
कैसे अंकुरित हो पाते हैं बीज
इस आत्महत्या के युग में
कैसे बची रह पाती है
जीने की ललक
दुनिया को बदल डालने
की सनक
कैसे हृदय के कोमल हिस्से में
चुपचाप छिपे रहते हैं
इन्द्रधनुषी सपने। 
-दिनकर कुमार इरशाद


6 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. इस भयावह काल में आपदा केवल मनुष्यों पर है और जो जैसा मनुष्य रहा अब भी वैसा ही है

    सुन्दर रचना

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 10 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. बहुत ही अच्छी कविता!

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