Thursday, January 23, 2014

यहाँ तो झूट का ऐ यार बोलबाला है...........मुमताज़ नाज़ाँ



हक़ीक़तों की सदा कौन सुनने वाला है
यहाँ तो झूट का ऐ यार बोलबाला है

अब आज़माये हुए को भी आज़माना क्या
वो शख्स अपना हमेशा का देखा-भाला है

शफ़क़ के रुख़ पे शबे-ग़म का ख़ून बिखरा है
सहर का आज तो कुछ रंग ही निराला है

गिला करें भी तो बेमेहरियों का किस से करें
ज़मीर मुर्दा है और दिल सभी का काला है

है अपनी दुनिया तो दिल के नियाज़ख़ाने में
यही कलीसा है अपना यही शिवाला है

ग़ुरूरे-ज़ात सलामत, ये जाँ रहे न रहे
जिगर का ख़ून पिला कर अना को पाला है

हर एक याद शबे-ग़म में जगमगाती है
‘अंधेरा है, कि तेरे हिज्र में उजाला है’

है लबकुशाई भी संगीन जुर्म ऐ “मुमताज़”
हैं फ़िक्रें ज़ख़्मी, ज़ुबानों पे सब की ताला है

मुमताज़ नाज़ाँ 
09167666591 09867641102

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Wednesday, January 22, 2014

एक नया अनुभव.............हरिवंशराय बच्चन



मैंनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एक
कविता लिखना चाहता हूं।

चिड़िया ने मुझसे पूछा, "तुम्हारे शब्दों में
मेरे परों की रंगीनी है ?"
मैंनें कहा, 'नहीं'
"तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है?"
'नहीं'
"तुम्हारे शब्दों में मेरे डैने की उड़ान है?"
'नहीं'
"जान है?"
'नहीं'

'तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे!'
मैंनें कहा, 'पर तुमसे मुझे प्यार है'
चिड़िया बोली,
'प्यार से शब्दों क्या सरोकार है.'

एक अनुभव हुआ नया.
मैं मौन हो गया!


-हरिवंशराय बच्चन
आज की मधुरिमा में प्रकाशित रचना

बीत न जाए शिशिर.................कुंती मुखर्जी


घटा हवा का ताप
बढ़ा मन का अभिलाष
पतझड़ के भय से
शिशिर रीत न जाए
बिन पिया,
गजरे का क्या मोल सखी।

खिली है गुलाबी धूप
देख! गगन का नीलाभ आंचल
श्वेत कपोत करते किल्लोल
यादों की डोर थामे
दुलारूं बीते दिनों को।

लिख दे प्रीतम को पाती
बीत न जाए कहीं
ये शिशिर के दिन सखी।

-कुंती मुखर्जी

Tuesday, January 21, 2014

वो ख्वाब....जो करीने-कयास थे................ज़हूर नज़र


दिन ऐसे तो यूं आए ही कब थे जो रास थे
लेकिन ये चंद रोज तो बेहद उदास थे

उनको भी आज मुझसे हैं लाखों शिकायतें
कल तक जो अहले-बज़्म सरापा-सियास थे

वो गुल भी ज़हर-ख़ंद की शबनम से अट गए
जो शाख़सार दर्दे - मुहब्बत की आस थे

मेरी बरहनगी पे हंसे हैं वो लोग भी
मशहूर शहर भर में जो नंगे-लिबास थे

इक लफ़्ज भी न मेरी सफ़ाई में कह सके
वो सारे मेहरबां जो मिरे आस-पास थे

तेरा तो सिर्फ़ नाम ही था, तू है क्यों मलूल
बाईस मिरे जुनू का तो मेरे हवास थे

वो रंग भी उड़े जो नज़र में न थे कभी
वो ख्वाब भी लुटे जो करीने-कयास थे

-ज़हूर नज़र
जन्मः 22 अगस्त, 1923, मिंटगुमटी, साहीवाल

अहले-बज़्मः सभा में उपस्थित, सरापा-सियासः बहुत अधिक गुणगान करने वाले, ज़हर-ख़ंदः खिसियानी, शाख़सारः जहां बहुत सारे पेड़ हों, बरहनगीः नग्नता, नंगे-लिबासः नग्न, मलूलः उदास, बाईसः कारण, हवासः इन्द्रियां, करीने-कयासः जो बात अटकल और अन्दाजे से ठीक हो

Sunday, January 19, 2014

धूप और छांव की दोस्ती अज़ब गुजरी....ज़हूर नज़र

* फ़स्ले-गुल *
हर घड़ी कयामत थी, ये न पूछ कब गुज़री
बस यी गनीमत है, तेरे बाद शब गुज़री

कुंजे-गम में एक गुल भी न खिल सका पूरा
इस बला की तेज़ी से सरसरे-तरब गुज़री

तेरे गम की खुशबू से ज़िस्मों-ज़ां महक उट्ठे
सांस की हवा जब भी छू के मेरे लब गुजरी

एक साथ रह कर भी दूर ही रहे हम-तुम
धूप और छांव की दोस्ती  अज़ब गुजरी

जाने क्या हुआ हमको अब के फ़स्ले-गुल में भी
बर्गे-दिल नहीं लरज़ा, तेरी याद जब गुज़री

बेक़रार, बेकल है ज़ां सुकूं के सहरा में
आज तक न देखी थी ये घड़ी जो अब गुजरी

बादे-तर्के-उलफ़त भी यूं न जिए, लेकिन
वक़्त बेतरह बीता,उम्र बेसबब गुज़री

किस तरह तराशोगे, तुहमते-हवस हमपर
ज़िन्दगी हमारी तो सारी बेतलब गुज़री

सरसरे-तरबः आनंद की हवा, फ़स्ले-गुलः वसंत ऋतु,
बर्गे-दिलः दिल का पता, बादे-तर्के-उलफ़तः प्रेम विच्छेदन का पश्चात, 
तुहमते-हवसः लोलुपता का आरोप

-ज़हूर नज़र
जन्मः 22 अगस्त, 1923, मिंटगुमटी, साहीवाल

Friday, January 17, 2014

अपना किरदार मोतबर रखना............ दानिश भारती



पाँव जब भी इधर-उधर रखना
अपने दिल में ख़ुदा का डर रखना

रास्तों पर कड़ी नज़र रखना
हर क़दम इक नया सफ़र रखना

वक़्त, जाने कब इम्तेहां माँगे
अपने हाथों में कुछ हुनर रखना


मंज़िलों की अगर तमन्ना है
मुश्किलों को भी हमसफ़र रखना

खौफ़, रहज़न का तो बजा, लेकिन
रहनुमा पर भी कुछ नज़र रखना

सख्त लम्हों में काम आएँगे
आँसुओं को सँभाल कर रखना

चुप रहा मैं, तो लफ़्ज़ बोलेंगे
बंदिशें मुझ पे, सोच कर रखना

आएँ कितने भी इम्तेहां  "दानिश"
अपना किरदार मोतबर रखना

-दानिश भारती

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रहज़न=लुटेरा, रहनुमा=मार्ग दर्शक, किरदार=चरित्र, मोतबर=निर्मल/साफ़

Thursday, January 16, 2014

एक ज़रा सा दिल टूटा है...............क़तील शिफ़ाई


सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको
जो दरीचा भी खुले तो नज़र आए मुझको।।

सदियों का रस जगा मेरी रातों में आ गया
मैं एक हसीन शख्स की बातों में आ गया।।

जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए
देर तक अपने बदन से तेरी खुश़बू आए।।

गुस्ताख हवाओं की शिकायत न किया कर
उड़  जाए  दुपट्टा  तो  खऩक  कर ।।

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और कोई बात नहीं।।

रात के सन्नाटे में हमने क्या-क्या धोखे खाए हैं
अपना ही दिल धड़का तो हम समझे वो आए हैं।।
 

- क़तील शिफ़ाई

 

जन्मः दिसम्बर,1919, हरिपुर 
अवसानः जुलाई,2001, लाहोर

रसरंग,रविवार12, जनवरी,2014