Saturday, December 6, 2014

मील का पत्थर........ दिनेश विजयवर्गीय










कदमों की प्रगति की पहचान है
मील का पत्थर
वह अलसाए कदमों में
जान डालकर
उन्हें कर देता है गतिमय
जल्द मंजिल की ओर
बढ़ने के लिये।

वह केवल पत्थर नहीं
हमारी यात्रा का प्रगति सूचक है
आगे बढ़ते रहने के लिए
प्रोत्साहन भी देता है वह।

जेठ की तपती धूप हो या
पौष की कड़कती ठण्ड या हो
सावन-भादो की वर्षा
वह हर मौसम झेलकर भी
सड़क के किनारे खड़ा रहकर
हमें जोड़े रखता है।
अपनी यात्रा की प्रगति से।

वह करता नहीं कभी
कोई शिकायत
अपने बदरंग करते
वाहनों की
छोड़ी गई कालिख का
उड़ाई गई धूल और
चिंघाड़ती आवाजों का
वह तो सदा एक ही मुद्रा में
चुप-चुप सहता है
अपने भाग्य में आई
प्रतिकूलताओं को।

अपने गुणों के खातिर ही
उसे देश-दुनिया में मिली है
सम्मान से भरी पहचान
मील का पत्थर साबित होने की
वाह...! मील के पत्थर,
तुम्हें जन-जन का सलाम।

-दिनेश विजयवर्गीय
.....पत्रिका से

Friday, December 5, 2014

हवाओं के मुक़ाबिल हूँ......पूजा भाटिया



हवाओं के मुक़ाबिल हूँ
चराग़ों की वो महफ़िल हूँ

ख़ुदा जाने कहाँ हूँ मैं
न बाहर हूँ न शामिल हूँ

मिरे कांधे पे वो बिखरे
हैं मौज इक वो मैं साहिल हूँ

ये चादर, सलवटें, तकिया
बताते हैं, मैं ग़ाफ़िल हूँ

मैं जो चाहे वो पा लूं, पर
अभी ख़ुद ही से ग़ाफ़िल हूँ

यहां सच बेसहारा है
सहारा दूँ? मैं बातिल हूँ

उमीदें तुम से रखती हूँ
कहो तो कितनी जाहिल हूँ

जुआ है ज़िन्दगी जैसे
जो जीते उसको हासिल हूँ

रहे ज़द में जुनूँ जिसके
उसी को फिर मैं हासिल हूँ

पूजा भाटिया 08425848550


http://wp.me/p2hxFs-1Sh

Wednesday, December 3, 2014

क़दम इंसान का राह-ए-दहर...........जोश मलीहाबादी

क़दम इंसान का राह-ए-दहर में थर्रा ही जाता है
चले कितना ही कोई बच के ठोकर खा ही जाता है

नज़र हो ख़्वाह कितनी ही हक़ाइक़-आश्ना फिर भी
हुजूम-ए-कशमकश में आदमी घबरा ही जाता है

ख़िलाफ़-ए-मसलेहत मैं भी समझता हूँ मगर नासेह
वो आते हैं तो चेहरे पर तहय्युर आ ही जाता है

हवाएं ज़ोर कितना ही लगाएँ आँधियाँ बनकर
मगर जो घिर के आता है वो बादल छा ही जाता है

शिकायत क्यों इसे कहते हो ये फ़ितरत है इंसान की
मुसीबत में ख़याल-ए-ऐश-ए-रफ़्ता आ ही जाता है

समझती हैं म'अल-ए-गुल मगर क्या ज़ोर-ए-फ़ितरत है

-जोश मलीहाबादी


   
राह-ए-दहर - जीवन की राह
   
हक़ाइक़-आश्ना - सच्चाई को चाहने वाला
   
हुजूम-ए-कशमकश - मु्श्किलों की भीड़
  
ख़िलाफ़-ए-मसलेहत - समझदारी के उलट
   
तहय्युर - बदलाव
   
ख़याल-ए-ऐश-ए-रफ़्ता - खुशनुमा गुज़रे वक्त का ख्याल
   
म'अल-ए-गुल - नतीज़ा
......मधुरिमा से

Saturday, November 29, 2014

जाने क्यूँ !!!...................सदा

 










शब्दों की चहलकदमी से
आहटें आती रहीं
सन्नाटे को चीरता
एक शोर
कह जाता कितना कुछ
मौन ही !
बिल्कुल वैसे ही
मेरी खामोशियाँ आज भी
तुमसे बाते करती हैं
पर ज़बां ने खा रखा है
चुप्पी का नमक
कुछ भी कहने से
इंकार है इसे
जाने क्यूँ !!! 

-सदा
......फेसबुक से

अबला नहीं ये है सबला.........जयश्री कुदाल





यूं तो आई तूफान-सी बाधाएं
आई सुनामी-सी मुश्किलें

तोड़ने को मेरे सपनों का घरौंदा

पर मैं न हारी न टूटी

न मैं किस्मत से रूठी


न मैं रोई न बेबस हुई

न छोड़ी मैंनें लेका-सच्चाई

अब बस आगे बढ़ना है

न हारना है न रुकना है

क्यूंकि जब मैंनें हिम्मत करी
मेरे सपनों ने उड़ान भरी..

-जयश्री कुदाल..

.............पत्रिका से



इस कविता को पढ़कर ऐसा लगा कि ये नई कलम है
आपकी राय इनको प्रोत्साहित करेगी.....सादर





Friday, November 28, 2014

मैं अनाथ हूँ तो क्या.........वन्दना गुप्ता

 












मैं अनाथ हूँ तो क्या
मुझे न मिलेगा प्यार कभी
किसी की आँख का तारा कभी
क्या कभी बन पाऊँगा
किसी के घर के आँगन में
फूल बनकर महकूंगा कभी

ओ दुनिया वालों
मैं भी तो इक बच्चा हूँ
माना कि तुम्हारा खून नहीं हूँ
न ही संस्कार तुम्हारे हैं
फिर भी हर बाल सुलभ
चेष्टाएं हैं तो मेरी भी वही
क्या संस्कार ही बच्चे को
माँ की गोद दिलाते हैं
क्या खून ही बच्चे को
पिता का नाम दिलाता है
क्या हर रिश्ता केवल
खून और संस्कार बनाता है

तुम तो सभ्य समाज के
सभ्य इंसान हो
फिर क्यूं नही
मेरी पीड़ा समझ पाते हो
मैं भी तरसता हूँ
माँ की लोरी सुनने को
मैं भी मचलना चाहता हूँ
पिता की उँगली पकड़
मैं भी चलना चाहता हूँ

क्या दूसरे का बच्चा हूँ
इसीलिए मैं बच्चा नहीं
यदि खून की बात है तो
ईश्वर ने तो न फर्क किया
फिर क्यूँ तुम फर्क दिखाते हो
लाल रंग है लहू का मेरे भी
फिर भी मुझे न अपनाते हो
अगर
खून और संस्कार तुम्हारे हैं
फिर क्यूँ आतंकियों का बोलबाला है

हर ओर देश में देखो
आतंक का ही साम्राज्य
है
अब कहो दुनिया के कर्णधारों
क्या वो खून तुम्हारा अपना नहीं

एक बार मेरी ओर निहारो तो सही
मुझे अपना बनाओ तो सही
फिर देखना तुम्हारी परवरिश से
ये फूल भी खिल जाएगा
तुम्हारे ही संस्कारों से
दुनिया को जन्नत बनाएगा
बस इक बार
हाथ बढ़ाओ तो सही
हाथ बढ़ाओ तो सही


-वन्दना गुप्ता
.....सुरुचि, नवभारत से


प्रेम और स्पर्श..............अमिता प्रजापति





प्रेम और स्पर्श
मेरे दो बच्चे हैं
स्पर्श कुछ अधिक चंचल है
दौड़ता है दूर-दूर तक
पूछ-पूछ कर
परेशान रखता है

दूसरा- प्रेम, जरा
गम्भीर है
बहुत संकट में ही मां
पुकारता
है
और अधिकतर समय
खुद ही अपनी
मां बना रहता है।

-अमि
ता प्रजापति

...... नायिका से