कितना आसान हैतोड़ना...
आदतों में शुमार है
तोड़ना...
तोड़े जाते हैं
विधायक और सांसद
भला होता है
दोनों का
पर.....
दुख होता है
तोड़े जाने का...
शब्दों को...
कितनी आसानी से
तोड़-मरोड़ डालतें हैं
ये गरीब शब्दों को
भाव ही बदल जाते हैं
शब्दों के...
तोड़े जाने के बाद
ज़रा पढ़िये ध्यान से
मूल कविता
और जोड़-तोड़ कर
बनाई कविता को
दोनों के भाव में
फर्क महसूस होगा
बिलकुल वैसा ही
जैसे....
शक्कर की मिठास और
सैकरीन की कड़ुवाहट
भरी मिठास में होता है....
एक अनुनय
कविताएं.....
मन से प्रसवित होती है
मूल रूप में ही रहने दें
-यशोदा



