Friday, June 9, 2017

तन -मन भिगो रही आज ... अलका गुप्ता

यादों की हरश्रृंगारी महक ।
अल्हड उन बतियों की चहक ।

ढलकी - ढलकी चितवन ये 
रूखे अधरों का कंपन ये ।

बिखर गई अलकों में ...
बीते दिनों की राख सी ...

सिमट गई लाली जो ...
झुर्रियों में अनायास ही ...

कसक बहुत रही है आज ।
जो तोड़ ना सके थे कायर हाथ ।

उन बीते दिनों के अनचाहे ...
बंधनों की झूठी लाज ।।

-अलका गुप्ता 

Thursday, June 8, 2017

चांद बेवफा नहीं होता.....स्मृति आदित्य









चांद नहीं कहता 
तब भी मैं याद करती तुम्हें 
चांद नहीं सोता 
तब भी मैं जागती तुम्हारे लिए 
चांद नहीं बरसाता अमृत 
तब भी मुझे तो पीना था विष 
चांद नहीं रोकता मुझे 
सपनों की आकाशगंगा में विचरने से 
फिर भी मैं फिरती पागलों की तरह 
तुम्हारे ख्वाबों की रूपहली राह पर।   

चांद ने कभी नहीं कहा 
मुझे कुछ करने से 
मगर फिर भी 
रहा हमेशा साथ 
मेरे पास
बनकर विश्वास। 
यह जानते हुए भी कि 
मैं उसके सहारे   
और उसके साथ भी
उसके पास भी 
और उसमें खोकर भी 
याद करती हूं तुम्हें। 
मैं और चांद दोनों जानते हैं कि 
चांद बेवफा नहीं होता। 
-स्मृति आदित्य

Wednesday, June 7, 2017

लौट के वो घर आती है....अलका प्रमोद







दौड़ में अंधी दौड़ पड़े हो, 
दूर देश में जा बसने,
पर कितने दिन रह पाओगे, 
उखड़ के जड़ से तुम अपने,

कब तक ऊंचे उड़ोगे आख़िर, 
कभी तो तुम थक जाओगे ,
तब ढूँढोगे एक छाँव पर, 
कहीं न ढूंढे पाओगे,

देखा है चिड़िया को उड़ते, 
लौट के वो घर आती है,
जब तक बंधी पतंग डोर से, 
तभी तलक उड़ पाती है,

है अभी समय मुड़ कर देखो, 
घर राह तुम्हारी तकता है,
हवा अभी भी है अपनी, 
बंद किया तुम्हीं ने रस्ता है,

खोलो खिड़की पिछवाड़े की हवा 
उधर से भी आने दो,
थाम के रखो नेह डोर, 
पहचान न पथ की खो जाने दो। 
-अलका प्रमोद

Tuesday, June 6, 2017

चंद हाईकू....अलका गुप्ता

बढ़ा तू हाथ !
भूल सारे विषाद !
पीछे से हँसी ! 

नन्हीं सी ख़ुशी !
हँसेगा सारा जहाँ !
तेरे साथ ही ! 

जिन्दगी तेरी !
बिताना क्या गमों में !
ढूंढ ले खुशी ! 

कर श्रृंगार !
हृदय गुलाब से !
सहज कर ! 

नियामत है !
तोहफ़ा है जिन्दगी !
है बंदगी भी ! 

Monday, June 5, 2017

रात ग़ालिब तिलमिलाया देर तक.....श्रीमती आशा शैली


ज़िन्दगी ने आज़माया देर तक।
दर्द ने रिश्ता निभाया देर तक।।

हम ज़माने पर बहुत भारी पड़े,
प्यार का जादू चलाया देर तक।

बे वजह बरबादियों का सिलसिला,
रास ही हमको न आया देर तक।

देखकर महफ़िल की ये ज़िंदादिली,
रात ग़ालिब तिलमिलाया देर तक।

इक ग़ज़ल बढ़िया-सी कहने के लिए,
हर रुकन हमने मिलाया देर तक।
-श्रीमती आशा शैली 

Sunday, June 4, 2017

सवालों के अंबार हैं...ठाकुर दास 'सिद्ध'


ज़माना सरल तो नहीं। 
परोसा गरल तो नहीं।

अँधेरे में रोशन दिखा, 
किसी का महल तो नहीं।

भटकता फिरे है कोई, 
हुआ बेदख़ल तो नहीं।

मिली है हुकूमत उसे, 
दुखी आज-कल तो नहीं।

धुँधलका है क्यों सामने, 
नज़र ही सजल तो नहीं।

सवालों के अंबार हैं, 
मिला कोई हल तो नहीं।

ज़ुबाँ पर अलग राग है, 
लिया दल बदल तो नहीं।

लगे है जमीं डोलती, 
रहा खल उछल तो नहीं।

मेरे ज़ख़्म के रंग सी,
खड़ी है फसल तो नहीं।

कहें क्या मुलाकात हम, 
मिला एक पल तो नहीं।

नहीं दीखता आज-कल, 
गया वो निकल तो नहीं।

कही 'सिद्ध' ने जो अभी, 
कहीं वो ग़ज़ल तो नहीं।

- ठाकुर दास 'सिद्ध'

Saturday, June 3, 2017

प्रश्न लाचार खड़ा..मौन क्यूँ.....अलका गुप्ता


जल रहे गीता कुरान भी ...
साम्प्रदायिकता की आग में ।
वहशत नग्न नाच रही ...
शस्त्र लिए हाथ में ।

आत्मा ही मर गई जिनकी ।
मानवता को कुचल उनकी ।
यही आतंकवाद है ...
क्या यही जेहाद है...?

प्रश्न लाचार खड़ा..मौन क्यूँ ?
जब तडफ रही ...हर तरफ ।
हर दिल ...हर आँख है ।।
-अलका गुप्ता