Tuesday, September 30, 2014

कुएं की तलाश में.............ललिता परमार



 













पूछ रहा था पता
भटक रहा था
मेंढक कुएं की
तलाश में
यहां से वहां
नदी, तालाबों में
सुरक्षित नहीं था
वह कुआं जो आज
किंवदंती वन
गुम हो गया
दे दी अपनी
जगह नलकूपों को
कुआं जहां पहले
राहगीरों की प्यास
के लिये राह में
खड़े रहते थे,
इन्तजार में
किसी प्यासे के लिये
आज उसी कुएं की
तलाश में भटक रहा है
मेंढ़क
बड़े फख्र से कहलाने के
लिए
कुएं का मेंढ़क

-ललिता परमार
....पत्रिका से

Monday, September 29, 2014

अस्तित्व.............अनुप्रिया



 


















तुम उड़ती हो
उड़ जाता है मेरा
मन आकाश की
खुली बाहों में
बेफिक्री से

तुम टूटती हो
टूट जाता है
अस्तित्व
भड़भड़ाकर

तुम प्रेम करती हो
भर जाती हूँ मैं
गमकते फूलों
की क्यारियों से

तुम बनाती हो
अपनी पहचान
लगता है
मैं फिर से जानी
जा रही हूँ

तुम लिखती हो
कविताएं
लगता है
सुलग उठे हैं
मेरे शब्द तुम्हारी
कलम की आंच में


-अनुप्रिया
..... नायिका से

Sunday, September 28, 2014

अहिल्या को नहीं भुगतना पड़ेगा..........यशोदा



















विडम्बना
यही है की
स्वतंत्र भारत में
नारी का
बाजारीकरण किया जा रहा है,

प्रसाधन की गुलामी,
कामुक समप्रेषण
और विज्ञापनों के जरिये
उसका..........
व्यावसायिक उपयोग
किया जा रहा है.

कभी अंग भंगिमाओं से,
कभी स्पर्श से,
कभी योवन से तो
कभी सहवास से
कितने भयंकर परिणाम
विकृतियों के रूप में
सामने आए हैं,

यही नही
अनाचार के बाद
जिन्दा जला देने
जैसी निर्ममता से
किसी की रूह
तक नहीं कांपती

क्यों....क्यों..
आज भी
पुरुषों के लिये
खुले दरवाजे

और....और..
स्त्रियों के लिये
उफ.......
कोई रोशनदान तक नहीं?

मैं कहती हूँ....
स्त्री नारी होती नहीं
बनाई जाती है.

हम सबको
अब यह संकल्प लेना होगा
कि अब और नहीं..
कतई नहीं,
अब किसी इन्द्र के
पाप का दण्ड
अब किसी भी
अहिल्या को
नहीं भुगतना पड़ेगा

मन की उपज
-यशोदा

Saturday, September 27, 2014

जो मेहँदी से कट गयी.........सचिन अग्रवाल


मेहनतकशों की सख्त हथेली से कट गयी
दीवार जो कुंए की थी रस्सी से कट गयी 

क्या ज़ायका है खून का अपने को क्या पता
अपनी तो सूखी रोटी से चटनी से कट गयी 

अंदाजा है तुम्हे कि किसी का थी वो नसीब
हाथों की एक लक़ीर जो मेहँदी से कट गयी

तन्हाई,जख्म माज़ी के और कोई धुंधली याद
एक सर्द रात गीली अंगीठी से कट गयी

मर्ज़ी से अपनी मरने का मौका भी कब मिला
और ज़िन्दगी भी औरों की मर्ज़ी से कट गयी

( नए मरासिम में प्रकाशित)

-सचिन अग्रवाल

Friday, September 26, 2014

तेरे बगैर.............निकेत मलिक



उम्रेदराज़ काट रहा हूँ तेरे बगैर
गुलों से खार छांट रहा हूँ तेरे बगैर

हंसने को जी करे है न, रोने को जी करे
मुर्दा शबाब काट रहा हूँ तेरे बगैर

क्या जुर्म किया था जो, हिज़्र की सजा मिली
नाकरदा गुनाह को छांट रहा हूँ तेरे बगैर

ज़ख़्मों को सी लिया है, होंठों को सी लिया,
फिर भी खुद को डांट रहा हूँ तेरे बगैर

चंद लम्हें फुरसत के अब नसीब हुए हैं
गैरों के बीच बांट रहा हूँ तेरे बगैर

-निकेत मलिक
.....परिवार, पत्रिका

Thursday, September 25, 2014

कैसा-कैसा दर्द रिसता है..........यशोदा

 











विचित्र है..
और सत्य भी तो है,
कि हजारों वर्ष के
इतिहास नें कभी भी,
किसी ने भी
नारी की आर्थिक स्थिति की
ओर ध्यान ही नहीं दिया

और .......
इसी के चलते
देश की बेटियां,
बहनें और माताओं को
इसी अर्थव्यवस्था
के चलते समाज में
हीन भावनाओं और
दासत्व से ग्रषित ही रही.

दासप्रथा के मूल में
नारी के प्रति
असहिष्णुता ही है
और यह
सामाजिक सोच है
जो स्त्रियों और पुरुषों को
अलग अलग नियमों के
खाकों में जकड़ देती है
और पुरुष कभी
देख और सुन ही नहीं पाता

और..........
वहीं स्त्री भीतर
कितना और
कैसा-कैसा दर्द रिसता है,
इसकी भावनात्मक वेदना
तो दूर मानवता के नाते
गहरी संवेदना भी
नहीं उपजती
जो की.....
उपजनी चाहिये

मन की उपज
-यशोदा

Wednesday, September 24, 2014

तुमने चख लिया हर रंग का लहू.......अजन्ता देव














तुम्हारी जिव्हा
ठांव-कुठांव टपकाती है लार
इसे काबू में रखना तुम्हारे वश में कहां
तुमने चख लिया हर रंग का लहू


परन्तु एक बार आओ
मेरी राम रसोई में
अग्नि केवल तुम्हारे जठर में
नहीं, मेरे चूल्हे में भी है
ये पृथ्वी स्वयं हांडी बनकर
खदबदा रही है


केवल द्रौपदियों को ही
मिलती है यह हांडी
पांच पतियों के
परम सखा से

- अजन्ता देव


..... नायिका से...