Tuesday, December 10, 2019

रिश्तों पर बर्फ....... दिलबागसिंह विर्क


अहम् की पट्टी 
स्वार्थ के फाहे रखकर 
जब बाँध लेते हैं हम 
सोच की आँखों पर 
तब जम जाती है 
रिश्तों पर बर्फ 
दम घुट जाता है रिश्तों का 

दिल में गर्माहट रखकर 

बढाते हैं जब हाथ 
मिट जाती हैं सब दूरियां 
पिघल जाती है बर्फ 
जीवित हो उठते हैं रिश्ते 
प्यार की संजीविनी पाकर 

रिश्तों पर बर्फ 

जमने और पिघलने का 
कोई मौसम नहीं होता 
अविश्वास, अहम्, स्वार्थ  
जमा देते हैं बर्फ 
विश्वास, वफा, प्यार 
पिघला देते हैं इसे !!

लेखक परिचय - दिलबागसिंह विर्क 


Monday, December 9, 2019

आओ, अलाव जलाएँ....ओंकार


आओ, अलाव जलाएँ,
सब बैठ जाएँ साथ-साथ,
बतियाएँ थोड़ी देर,
बांटें सुख-दुख,
साझा करें सपने,
जिनके पूरे होने की उम्मीद 
अभी बाक़ी है.

हिन्दू, मुसलमान,

सिख, ईसाई,
अमीर-गरीब,
छोटे-बड़े,
सब बैठ जाएँ 
एक ही तरह से,
एक ही ज़मीन पर,
खोल दें अपनी 
कसी हुई मुट्ठियाँ,
ताप लें अलाव.

घेरा बनाकर तो देखें,

नहीं ठहर पाएगी 
इस अलाव के आस-पास 
कड़ाके की ठंड...!!

लेखक परिचय - ओंकार 


Sunday, December 8, 2019

सौन्दर्यबोध ....श्वेता सिन्हा

दृष्टिभर
प्रकृति का सम्मोहन
निःशब्द नाद
मौन रागिनियों का
आरोहण-अवरोहण
कोमल स्फुरण,स्निग्धता
रंग,स्पंदन,उत्तेजना,
मोहक प्रतिबिंब,
महसूस करता सृष्टि को 
प्रकृति में विचरता हृदय
कितना सुकून भरा होता है
पर क्या सचमुच,
प्रकृति का सौंदर्य-बोध
जीवन में स्थायी शांति
प्रदान करता है?
प्रश्न के उत्तर में
उतरती हूँ पथरीली राह पर
 कल्पनाओं के रेशमी 
 पंख उतारकर
ऊँची अटारियों के 
मूक आकर्षण के 
परतों के रहस्यमयी,
कृत्रिमताओं के भ्रम में
क्षणिक सौंंदर्य-बोध
के मिथक तोड़
खुले नभ के ओसारे में
टूटी झोपड़ी में
छिद्रयुक्त वस्त्र पहने
मुट्ठीभर भात को तरसते
नन्हें मासूम,
ओस में ओदायी वृक्ष के नीचे
सूखी लकडियाँ तलाशती स्त्रियाँ
बारिश के बाद
नदी के मुहाने पर बसी बस्तियों
की अकुलाहट
धूप से कुम्हलायी
मजदूर पुरुष-स्त्रियाँ
कूड़ों के ढेर में मुस्कान खोजते
नाबालिग बच्चे
ठिठुराती सर्द रात में
बुझे अलाव के पास
सिकुड़े कुनमुनाते 
भोर की प्रतीक्षा में
कंपकंपाते निर्धन,
अनगिनत असंख्य
पीड़ाओं,व्यथाओं 
विपरीत परिस्थितियों से
संघर्षरत पल-पल...
विसंगतियों से भरा जीवन
असमानता,असंतोष
क्षोभ और विस्तृष्णा
अव्यक्त उदासी के जाल में
भूख, 
यथार्थ की कंटीली धरा पर
रोटी की खुशबू तलाशता है
ढिबरी की रोशनी में
खनकती रेज़गारी में
चाँद-तारे पा जाता है
कुछ निवालों की तृप्ति में
सुख की पैबंदी चादर
और सुकून की नींद लेकर
जीवन का सौंदर्य-बोध 
पा जाता है
जीवन हो या प्रकृति
सौंदर्य-बोध का स्थायित्व
मन की संवेदनशीलता नहीं
परिस्थितिजन्य
 भूख की तृप्ति
 पर निर्भर है।
-श्वेता सिन्हा

Saturday, December 7, 2019

कब तक...? ....श्वेता सिन्हा

कब तक...?

फिर से होंगी सभाएँ
मोमबत्तियाँ
चौराहों पर सजेंगी
चंद आक्रोशित नारों से
अख़बार की
सुर्खियाँ फिर रंगेंगी
हैश टैग में
संग तस्वीरों के
एक औरत की
अस्मत फिर सजेगी
आख़िर हम कब तक गिनेंगे?
और कितनी अर्थियाँ
बेटियों की सजेंगी?
कोर्ट,कानूनों और भाषणों
के मंच पर ही
महिला सशक्तिकरण
भ्रूण हत्या,बेटी बचाओ
की कहानियाँ बनेंगी
पुरुषत्व पर अकड़ने वाले को
नपुंसक करने की सज़ा
कब मिलेगी?
मुज़रिमों को
पनाह देता समाज
लगता नहीं
यह बर्बरता कभी थमेगी
क्यों बचानी है बेटियाँ?
इन दरिन्दों का
शिकार बनने के लिए?
पीड़िता, बेचारी,अभागी
कहलाने के लिए
बेटियाँ कब तक जन्म लेंगी ?
-श्वेता सिन्हा
मूल रचना

Friday, December 6, 2019

मैं कच्‍ची मिट्टी.....सीमा सिंघल सदा


मैं उतरना चाहती हूं 
तेरे मन के आंगन में 
मां तेरी ही तरह 
बसना चाहती हूं सबके दिलों में 
यूं जैसे तेरी ममता 
बसती है ...दर्पण की तरह जिसमें 
जिसकी भी नजर पड़ती है 
उसे अपना ही 
अक्‍स नज़र आता है ... !!!

मैं कच्‍ची मिट्टी 

तुम उसकी सोंधी सी महक 
अंकुरित हुई तेरे 
प्‍यार भरे पावन मन में, 
तुलसी के चौरे की 
परिक्रमा करती जब तुम 
आंचल थामकर 
मैं चलती पीछे-पीछे 
संस्‍कार से सींचती 
तुम मेरा हर कदम 
मैं डगमगाती जब भी 
तुम उंगली पकड़ाती अपनी 
मैं मुस्‍करा के चलती 
संग तुम्‍हारे कदम से कदम मिलाकर ... !!!!

लेखक परिचय - सीमा सिंघल सदा


Thursday, December 5, 2019

देश में महँगी है ज़िंदगी ...दुष्यन्त कुमार


हालात-ए-जिस्म सूरत-ए-जाँ और भी ख़राब 
चारों तरफ़ ख़राब यहाँ और भी ख़राब 

नज़रों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे 
होंटों में आ रही है ज़बाँ और भी ख़राब 

पाबंद हो रही है रिवायत से रौशनी 
चिम्नी में घुट रहा है धुआँ और भी ख़राब 

मूरत सँवारने में बिगड़ती चली गई 
पहले से हो गया है जहाँ और भी ख़राब 

रौशन हुए चराग़ तो आँखें नहीं रहीं 
अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब 

आगे निकल गए हैं घिसटते हुए क़दम 
राहों में रह गए हैं निशाँ और भी ख़राब 

सोचा था उन के देश में महँगी है ज़िंदगी 
पर ज़िंदगी का भाव वहाँ और भी ख़राब 
-दुष्यन्त कुमार

Wednesday, December 4, 2019

खड़े है मुझको खरीदार देखने के लिए - राहत इंदौरी

खड़े है मुझको खरीदार देखने के लिए/ मै घर से निकला था बाज़ार देखने के लिए
खड़े है मुझको खरीदार देखने के लिए 
मै घर से निकला था बाज़ार देखने के लिए 

हज़ार बार हजारो की सम्त देखते है 
तरस गए तुझे एक बार देखने के लिए 

कतार में कई नाबीना लोग शामिल है 
अमीरे-शहर का दरबार देखने के लिए 

जगाए रखता हूँ सूरज को अपनी पलकों पर 
ज़मीं को ख़्वाब से बेदार देखने के लिए 

अजीब शख्स है लेता है जुगनुओ से खिराज़ 
शबो को अपने चमकदार देखने के लिए 

हर एक हर्फ़ से चिंगारियाँ निकलती है 
कलेजा चाहिए अखबार देखने के लिए 
- राहत इंदौरी