Friday, April 14, 2017

पड़ी मझधार में क़श्ती है किनारा दे दो.............महेश चन्द्र गुप्त ‘ख़लिश’

पड़ी मझधार में क़श्ती है किनारा दे दो
मेरे टूटे हुए इस दिल को सहारा दे दो

मुझे दुनिया की नहीं, दिल की नज़र से देखो
मेरी नज़रों को मुहब्बत का इशारा दे दो

मेरी मज़बूर तमन्ना पे करम फ़रमाओ
मेरे ख़्वाबों को हसीं एक नज़ारा दे दो

नहीं मालूम मेरा दिल क्यों बुझा सा है ये
तुम निगाहों से इसे कोई शरारा दे दो

कभी की थी जो ख़ता माफ़ करो उसको तुम 
मुझे चाहत का ख़लिश हक़ वो दुबारा दे दो.

बहर --- १२२२  ११२२  ११२२  २२

- महेश चन्द्र गुप्त ‘ख़लिश’

Thursday, April 13, 2017

और खूब पढ़ती हूँ....मैं










पढ़ती हूँ
और खूब पढ़ती हूँ....
चार ई-पत्रिकाएँ आती है
अखबार भी पढ़ती हूँ..

ये सोचकर कि
लिखना आ जाएगा
किसी ने कहा है कि
एक अच्छा पाठक भी

लेखक बन सकता है
पर अफसोस....
आते हैं भाव मन में
बस..आते ही

दो पंक्तियों में ही 
सिमट जाते हैं...
चार डायरियों के
पृष्ठ दो-दो पंक्तियो से 

भर गई है..
उन सबको जोड़कर भी देखा...
पर कविता को न बनना था
सो नहीं बनी....

ऐसा लगता है कि
भाग्य में सिर्फ और सिर्फ
संग्रहण,संयोजन
और संम्पादन ही
लिखा है...

मन की उपज..
यशोदा

डायरी में लिखी दो पंक्तिया..
आज तक रखे हैं पछतावे की अलमारी में,
एक दो वादे जो दोनों से निभाये ना गए…





Wednesday, April 12, 2017

उसके सिवा कोई न था............श्रीमती आशा शैली


मुझको बस इक आसरा, उसके सिवा कोई न था
जिस घड़ी कश्ती का मेरी नाखुदा कोई न था।

हैं मेरी तन्हाइयाँ पुरनूर तेरी याद से
तू ही तू था पास मेरे, दूसरा कोई न था।

तुमने मेरा हाथ थामा, मेरे रहबर आनकर
सामने मेरे बचा जब रास्ता कोई न था।

मैं तेरे दर पर सदा देती रही शामो-सहर
ये भी सच है पास मेरे मसअला कोई न था।

बंद आँखों से तेरा दीदार 'शैली' ने किया
एक पल भी दिल में मेरे दूसरा कोई न था।
-श्रीमती आशा शैली 


Tuesday, April 11, 2017

किस्मत वाली.........सुमन जैन लूथरा



सुधा को प्रसव पीड़ा शुरू हो गयी थी। उसने पति को फ़ोन किया तो जवाब मिला की अभी बॉस ने थोड़ा जरूरी काम दिया है वो ख़त्म किए बिना नहीं आ सकता। 
उसने सास की और कातर आँखों से देखा तो उसने कहा आज तो मेरी टांगों से खड़ा भी नहीं हुआ जाता, तेरे जेठ को कहती हूँ दुकान से आकार तुझे अस्पताल पहुंचा आए। 

अस्पताल में अकेले ही बिस्तर पर दर्द से तड़पती सुधा की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसे याद आ रहा था दो साल पहले इसी अस्पताल में उसने परी को जन्म दिया था। कितनी खुश थी वो अपने पहले बच्चे को ले कर पर बेटी की ख़बर से सब उसके ख़िलाफ़ हो गए थे। 

सास कमरे में आई थी और बड़बड़ाते हुए बाहर चली गयी बड़ी आई किस्मत वाली। माँ ने किस्मत वाली किस्मत वाली कह के हमारे माथे मड़ दी। पति ने भी जैसे बड़े बोझिल मन से परी को उठाया। नर्स ने जेठ जी से कहा लक्ष्मी हुई है – बधाई, भैया जी मिठाई खिलाओ। जेठ जी ने नर्स को बाहर बुला कर कहा – 'नी  कुड़ी दी की वदाई, कदे कुड़ी वी वदाई दा कारण हुंदी है।' 

तभी दर्द की तेज़ लहर उसे ख़यालों से वापिस ले आई। डॉक्टर नर्स से कह रही थी इनके घर से किसी को बुला लो अब टाइम नज़दीक आ गया है। सुधा दर्द से बेसुध हो गई थी जब होश आया तो गलियारे में से जेठ जी की आवाज़ आ रही थी–‘वदाई होवे, कुड़ी दे मुंडा होया।' 

भीगी आँखों से सुधा सोच रही थी लड़की बधाई की जननी हो सकती है पर उसका अपना जन्म? 
-सुमन जैन लूथरा 

Monday, April 10, 2017

काँटे हैं मेरे साथ बहुत........श्रीमती आशा शैली


नदी हूँ हर तरफ़ बहने की राह रखती हूँ
कोई हो रास्ता उस पर निगाह रखती हूँ

ये और बात है, काँटे हैं मेरे साथ बहुत
गुलाब हूँ मैं महक बेपनाह रखती हूँ

हरएक चीज़ से है प्यार का मेरा रिश्ता
हरएक फूल की मैं दिल में चाह रखती हूँ

तुम्हारी आँख में खटके न कहीं मेरी हँसी
दबा के होंठ मैं नीची निगाह रखती हूँ

हैं मेरे सीने में भी ग़म के कोहसार बहुत
मैं उन में नरगिसी फूलों की चाह रखती हूँ

बुलन्दियों की तरफ़ हर कदम ही चलना है
मैं आसमान पे शैली निगाह रखती हूँ
-श्रीमती आशा शैली 
मूल रचना

Sunday, April 9, 2017

जोड़-तोड़.....श्रीमती आशा शैली

बहुत गरीब थी वह, न घर न रोजग़ार। कभी दिहाड़ी-मज़दूरी मिल जाती और कभी-कभी उसमें भी नागा हो जाता। किराये के एक कमरे में ही नहाना-खाना और सोना सभी कुछ। पति का यह हाल था कि कभी कमाया, कभी घर बैठ कर दारु पी ली और माँ-बेटी को पीट दिया। माँ को मजूरी मिल गई तो जै-हरि वर्ना जो घर में हुआ उसी से काम चला लिया। पति चार दिन आ जाता और फिर गायब हो जाता। कभी-कभी माँ-बच्चों को दूसरों का दरवाज़ा भी देखना पड़ता। मायका दस घरों की दूरी पर होने के कारण उन्हें भूखा सोना नहीं पड़ता था वर्ना ऐसा होने में भी कोई कसर नहीं थी। 



ऐसे में उसका छोटा बच्चा बीमार हो गया। दर्द से छटपटाते बच्चे को लेकर वह डाक्टर के पास गई तो डाक्टर ने आप्रेशन करने को कह दिया। कुल ख़र्चा लगभग दस हज़ार बताया गया। जिस औरत के पास पैरों के लिए चप्पल ख़रीदने के पैसे न हों उसके लिए दस हज़ार आकाश-सुमन ही तो था, परंतु माँ थी वह, बच्चे को तड़पता कैसे देख सकती थी?

पूरे गाँव में इस घर से उस घर मदद माँगते उसे जब पन्द्रह दिन हो गए तो गाँव के मुखिया ने उसे सरकारी अस्पताल ले जाने की सलाह दी जहाँ बिना पैसे के बच्चे का आपरेशन हो सकता था।

बच्चे की माँ सोच रही थी कि इतना बड़ा गाँव है, यदि कुछ लोग उसे पाँच-पाँच सौ रुपये भी दे दें तो वह बच्चे के इलाज के बाद भी कुछ तो बचा ही लेगी और कुछ दिन का पेट का गुज़ारा हो जाएगा, परन्तु ऐसा नहीं होना था सो नहीं हुआ। 

पूरे गाँव में गिड़गिड़ाने के बाद भी उसे कहीं से एक पैसे की भी सहायता नहीं मिली। पंचायत प्रधान ने तरस खाकर बच्चे को सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा दिया। 

रैडक्रास की सहायता से बच्चे का इलाज तो हो गया परन्तु उसका जोड़-तोड़ धरा का धरा रह गया। उसकी दिनचर्या घूम फिर कर उसी पुराने ढर्रे पर आ गई।

-श्रीमती आशा शैली 

Saturday, April 8, 2017

ऐसा कुछ गुमान था.............प्रतिभा चौहान


अपनी हकीकत पर मुझे इत्मिनान था
क्योंकि मेरी नजरों में  आसमान था

खुली फिजा में होंगी राहत की बस्तियां
भटकती राहों को ऐसा  कुछ गुमान था

मंजिल यूं ही नहीं मिली इन नुमाइंदों  को
कई रतजगे, कई मशवरे ,कड़ा इम्तिहान था

उगा डाली सूखी दरारों में नमी की पत्तियाँ
पत्थरों में कहाँ  ऐसा  हौसला - ईमान था....
-प्रतिभा चौहान