Friday, April 7, 2017
Thursday, April 6, 2017
पैरों में छाले पड़े.........अशोक कुमार रक्ताले
परछाई छिपने लगी , देखें सूरज घूर।
पैरों में छाले पड़े, मंजिल फिर भी दूर।।
गहराया है सांझ का, रंग पुनः वह लाल।
सम्मुख काली रात है, और वक्त विकराल।।
मजबूरी अभिशाप बन, ले आती है साथ।
निर्लजता के पार्श्व में, फैले दोनों हाथ।।
धन-कुबेर कब पा सका, धन पाकर भी चैन।
तड़प-तड़प जीता रहा, मूँद लिए फिर नैन।।
उसके अपने अंत तक, साथ चले अरमान।
बचपन से सुनता रहा, जो केवल फरमान।।
-अशोक कुमार रक्ताले
Wednesday, April 5, 2017
जाने क्यों अब........कवि अनमोल तिवारी कान्हा
मैंने देखा हैं,
बैसाखियों के सहारे।
वृद्धाश्रम की ओर बढ़ते,
उस अपाहिज विधुर बाप को।।
जो चेहरे पर अनगिन,
झुर्रियों के निशान लिए।
वर्षों के अनुभवों को,
बयान कर रहा था भीड़ में।।
और सुना रहा था अपनी,
उस करूण गाथा को
जो रची थी उसके अपनों ने।
जिन्हें सदा चाहा था उसने।
और जागता रहा दिन रात ,
उनके सपनों को पूरा करने।।
मगर जाने क्यों अब?
वो ही सपनों के सौदागर
इस कदर ज़ालिम बन,
दे रहे थे ठोकरें।
और वो अपाहिज विधुर बाप ,
मज़बूत सहारे को तलाशता
दीवारों से टकराता
भटक रहा था इस कदर।।
और ढूँढ़ रहा था आश्रय कि ,
बच जाए उसका अस्तित्व
और मिलें उसके,
सपनों को आवाज़।
जहाँ कुछ पल ही सही पर,
समर्पण का भाव हों।
और भूखे पेट को तृप्त करें,
वो अन्न रूपी प्रसाद हों।।
-कवि अनमोल तिवारी "कान्हा"
बैसाखियों के सहारे।
वृद्धाश्रम की ओर बढ़ते,
उस अपाहिज विधुर बाप को।।
जो चेहरे पर अनगिन,
झुर्रियों के निशान लिए।
वर्षों के अनुभवों को,
बयान कर रहा था भीड़ में।।
और सुना रहा था अपनी,
उस करूण गाथा को
जो रची थी उसके अपनों ने।
जिन्हें सदा चाहा था उसने।
और जागता रहा दिन रात ,
उनके सपनों को पूरा करने।।
मगर जाने क्यों अब?
वो ही सपनों के सौदागर
इस कदर ज़ालिम बन,
दे रहे थे ठोकरें।
और वो अपाहिज विधुर बाप ,
मज़बूत सहारे को तलाशता
दीवारों से टकराता
भटक रहा था इस कदर।।
और ढूँढ़ रहा था आश्रय कि ,
बच जाए उसका अस्तित्व
और मिलें उसके,
सपनों को आवाज़।
जहाँ कुछ पल ही सही पर,
समर्पण का भाव हों।
और भूखे पेट को तृप्त करें,
वो अन्न रूपी प्रसाद हों।।
-कवि अनमोल तिवारी "कान्हा"
Tuesday, April 4, 2017
जिन्दग़ी वो सवाल देती है..........श्रीमती आशा शैली
ज़ीस्त तोहफ़े कमाल देती है
पेचो-ख़म सब निकाल देती है।
एक छोटी खुशी हमें अक्सर
ग़म के साँचे में ढाल देती है।
ता-कयामत न जिनका हल निकले
जिन्दग़ी वो सवाल देती है।
दिल की नादान-सी कोई लग़्ज़िश
जिन्दग़ी भर मलाल देती है।
इक तसव्वुर की झील सावन-सी
कश्तियों को उछाल देती है।
आँख उसकी हमारे अश्कों को
दामने दिल में डाल देती है।
तुम ज़ुबां से निकाल कर देखो
बात घर से निकाल देती है।
-श्रीमती आशा शैली
Monday, April 3, 2017
जिन्दगी का गणित..........मंजू मिश्रा

बरस महीने दिन
छोटे छोटे होते
अदृश्य ही हो जाते हैं
और मैं
बैठी रहती हूँ
अभी भी
उनको उँगलियों पे
गिनते हुए
बार बार
हिसाब लगाती हूँ
मगर
जिन्दगी का गणित है कि
सही बैठता ही नहीं
-मंजू मिश्रा
Sunday, April 2, 2017
Saturday, April 1, 2017
जीने के बहाने कब तक ढूंढते फिरे....मनीष कुमार ‘मुसाफिर’
हरेक दर्द से अब तो गुजर जाना है
करके खुद से वादा मुकर जाना है ।
जानते है कि जख्म जीने नही देंगे
दर्दे जिगर में थोड़ा उतर जाना है ।
जीने के बहाने कब तक ढूंढते फिरे
मौत आयेगी और हमें मर जाना है ।
क्या जानेगा बेदर्द जमाना कोई दर्द
अपने दर्द से थोड़ा संवर जाना है ।
अपनी मौत हम खुद मरना चाहेंगे
जीकर दो पल फिर ठहर जाना है ।
जिंदगी और मौत तो बस एक खेल
बनके खिलौना हमें बिखर जाना है ।
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